भारत जीतेगा, हम सब जीतेंगे

'हर बंद दरवाज़ा सज़ा नहीं होता'

भारत जीतेगा, हम सब जीतेंगे

समाज और सरकार, दोनों ने साइकिल को उतना महत्त्व नहीं दिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईंधन बचाने संबंधी जो अपील की, उसका असर धरातल पर दिखाई देने लगा है। कई राजनेताओं के अलावा न्यायाधीश, कलेक्टर और कर्मचारी भी ईवी या साइकिल से दफ्तर जा रहे हैं। जम्मू के कुछ इलाकों में तांगे चलने लगे हैं, जो कई साल पहले बंद हो गए थे। लोग बैलगाड़ी, ऊंटगाड़ी और साइकिल का उपयोग कर ईंधन बचाने में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। वहीं, कुछ लोग सोशल मीडिया पर भ्रामक टिप्पणियां कर इस मुहिम को नाकाम करना चाहते हैं। वे कह रहे हैं- 'कैसा जमाना आ गया? ... अब तो हो गया विकास! ... कार से साइकिल पर आ गए। ... देश को बैलगाड़ी के युग में पहुंचा दिया। ... आगे ईश्वर ही मालिक है।' एक कहावत है- 'हर बंद दरवाज़ा सज़ा नहीं होता।' अपनी सुरक्षा के लिए दरवाज़े को बंद करना भी ज़रूरी होता है। अगर तूफान आ जाए और व्यक्ति दरवाज़ा बंद कर सोचे, 'मैं घर में कैद हो गया।' क्या इससे समस्या दूर हो जाएगी? वहीं, कोई व्यक्ति दरवाज़ा बंद कर सोचे, 'मैं अब अधिक सुरक्षित हूं', तो वह तूफान का मजबूती से सामना कर सकेगा। परिस्थिति एक ही है, लेकिन अपनी सोच से व्यक्ति सुखी या दुखी होता है। आज हमें यह सोचकर आगे बढ़ना है कि इस दशक में वैश्विक महामारी और विदेश में युद्धों के बावजूद हमारा देश मजबूती से खड़ा है। हम पर इनका बहुत कम असर हुआ है। अगर कोई व्यक्ति कार के बजाय साइकिल चला रहा है तो वह भारत माता की सेवा कर रहा है। हमारे पास साइकिल के रूप में एक अच्छा विकल्प तो है। इसकी वजह से कितने ही लोगों का सफर जारी है। तेल महंगा हो या सस्ता, साइकिल उनका साथ नहीं छोड़ेगी।

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समाज और सरकार, दोनों ने साइकिल को उतना महत्त्व नहीं दिया, जितना देना चाहिए था। अगर कोई व्यक्ति दफ्तर जाने के लिए साइकिल खरीद ले तो लोग यह सोचते हैं कि उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है। पिछले चार दशकों में सड़कों पर कारों और मोटरसाइकिलों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है। उनके बीच साइकिल कहीं गुम-सी हो गई है। उसकी घंटी सुनकर ऐसा लगता है कि 'नक्कारखाने में तूती की आवाज' वाली कहावत साइकिल के लिए ही बनी है। अगर चार दशक पहले साइकिलों को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता, बेहतर प्रयोग किए जाते तो आज हमें पेट्रोल-डीजल की कीमतों की इतनी फिक्र नहीं करनी पड़ती। लोगों ने बार-बार साइकिल की उपेक्षा की, लेकिन इसने हर बार अपनी अहमियत साबित की। जो लोग जरा-सी चुनौती आते ही अपनी परेशानियां गिनाते हुए मैदान छोड़कर भागने का मंसूबा बना लेते हैं, वे भारत की शक्ति और सामर्थ्य से अनजान हैं। हमारे देश ने पूर्व में भीषण अकाल, खाद्यान्न संकट, युद्धों और अंतरराष्ट्रीय दबावों का सामना किया, जिसके बाद यह और ज्यादा मजबूत होकर उभरा। वर्तमान परिस्थितियां उनकी तुलना में कुछ नहीं हैं। आज कई देशों में भुखमरी की नौबत आ गई है। वहां रोटी की कीमत आसमान छू रही है। हमारे एक पड़ोसी देश में आटा खरीदने के लिए लंबी-लंबी कतारें लगती हैं। भारत में अन्न के भंडार भरे हुए हैं। कोई देश हम पर हमला करने से पहले हजार बार सोचेगा। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की जो दुर्गति हुई, उसे दुनिया देख चुकी है। आज भारत अंतरराष्ट्रीय दबावों की परवाह नहीं करता। वह अपने नागरिकों के हितों को प्राथमिकता देता है। पश्चिम एशिया में संघर्ष का जो असर हमारे देश पर हो रहा है, उसका हमें एकजुट होकर सामना करना चाहिए। विश्वास कीजिए, भारत जीतेगा, हम सब जीतेंगे। भविष्य में, जब पश्चिम एशिया में शांति हो जाए, तब इस बात का खास ध्यान रखना है कि हम दोबारा पुराने ढर्रे पर न चल पड़ें। भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। हमें पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर निर्भरता कम करनी है।

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