उर्वरक आत्मनिर्भरता का क्रांतिकारी मॉडल
ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें उर्वरकों में बदला जा सकता है
खेती-बाड़ी की जरूरत के बहुत बड़े हिस्से की घरेलू आपूर्ति हो सकती है
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक एमएल जाट ने उर्वरक आयात पर देश की निर्भरता कम करने के लिए जो सुझाव दिए हैं, वे अत्यंत प्रासंगिक हैं। देश को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने संसाधनों का विवेकपूर्वक इस्तेमाल करना होगा। भारत के पास ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें उर्वरकों में बदला जा सकता है। अगर सरकार योजना बनाए, विशेषज्ञों को जिम्मेदारी दे तो कुछ ही वर्षों में उर्वरक आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। देश में 140 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। हमें इतनी बड़ी आबादी को अपनी ताकत बनाना चाहिए। अगर मानव अपशिष्ट से उर्वरक बनाया जाए तो खेती-बाड़ी की जरूरत के बहुत बड़े हिस्से की घरेलू आपूर्ति हो सकती है। इस काम को सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से करना बहुत जरूरी है, ताकि स्वास्थ्य संबंधी कोई जोखिम न रहे। एक किसान अपना अनुभव कुछ यूं बताते हैं, 'हमारे गांव के बाहर एक खेत है। पहले, सभी लोग सुबह निवृत्त होने के लिए वहां जाते थे। जब बुआई का समय आता तो लोग वहां जाना बंद कर देते थे। उस खेत में (अन्य खेतों की तुलना में) फसल जोरदार होती थी।' अब घर-घर में शौचालय हैं, जो अच्छी बात है। खेतों के आस-पास बसावट भी काफी हो गई है। खुले में शौच जाने के साथ कई जोखिम जुड़े हैं। इससे कई बीमारियां फैलने का खतरा रहता है, इसलिए उस अस्वास्थ्यकारी प्रथा की वापसी नहीं होनी चाहिए। आज देशभर में शौचालयों की संख्या करोड़ों में है। क्या कोई ऐसी व्यवस्था हो सकती है, जिसके तहत निश्चित अवधि में शौचालयों से मानव अपशिष्ट लेकर उसे नजदीकी संयंत्र में पहुंचाया जाए और उससे उत्तम उर्वरक बनाया जाए?
मानव मूत्र में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम जैसे तत्त्व होते हैं। ये पौधों की जड़ों के विकास और फूल-फल बनने में मदद करते हैं। साथ ही, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। वैसे तो मानव मूत्र को प्राकृतिक तरल उर्वरक कहा जाता है, लेकिन इसे पौधों में सीधे डालना हानिकारक हो सकता है। इसका उचित विधि से शोधन होना जरूरी है। इसके लिए वैज्ञानिकों की मदद लेनी चाहिए। अगर देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसके संयंत्र लगाकर तरल उर्वरक बनाया जाए तो यह आत्मनिर्भरता की ओर बहुत बड़ा कदम होगा। भारत में रोजाना करोड़ों लीटर मानव मूत्र का उत्सर्जन होता है। यह बहुत बड़ा संसाधन साबित हो सकता है। इसमें वेस्ट टू वेल्थ बनने की भरपूर शक्ति एवं सामर्थ्य है। सोचिए, रोजाना कितनी मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम जैसे लाभदायक तत्त्वों का नुकसान हो रहा है? अगर चार-पांच दशक पहले संग्रहण एवं शोधन के लिए संयंत्र लगाए जाते तो आज हमारा देश उर्वरकों का कितना बड़ा निर्यातक बन सकता था? इससे देश में स्वच्छता को बढ़ावा मिलता। भारत में आज भी कई जगह जूठा-बासी खाना फेंका जाता है। उसके साथ फलों-सब्जियों के छिलके फेंक दिए जाते हैं। शादी और बड़े आयोजनों के अगले दिन बासी खाने के ढेर लगे रहते हैं। वहां मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं। आवारा पशु भी धमा-चौकड़ी मचाते हैं। कई सब्जी मंडियों में सड़े हुए फल-सब्जी यूं ही फेंक दिए जाते हैं। उनकी दुर्गंध से लोगों को बहुत परेशानी होती है। इसी तरह सूखी पत्तियां या तो जला दी जाती हैं या उनका एक जगह ढेर लगा दिया जाता है, जिसके बाद वे सड़ती रहती हैं। ये सभी चीजें उर्वरक क्रांति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। प्रकृति द्वारा दी गई कोई भी चीज अनुपयोगी नहीं होती। अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ उसका इस्तेमाल किया जाए तो नतीजे लाभदायक होते हैं।

