कैसे उतरे मन का यह बोझ?

मानसिक स्वास्थ्य को समग्र स्वास्थ्य का हिस्सा माना ही नहीं जाता!

कैसे उतरे मन का यह बोझ?

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा की जाती है

इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (आईपीएस) ने भारत में नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में जो आंकड़े जारी किए हैं, उन्हें सरकार और समाज को गंभीरता से लेना चाहिए। देश में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। चिंता की बात यह भी है कि मानसिक स्वास्थ्य को समग्र स्वास्थ्य का हिस्सा माना ही नहीं जाता! अगर कोई व्यक्ति ऐसी समस्या का सामना करने के बाद डॉक्टर से परामर्श लेने जाता है तो उसके बारे में कई तरह की बातें बनाई जाती हैं। शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए डॉक्टर के पास जा सकते हैं तो मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए डॉक्टर से परामर्श लेने में क्या बुराई है? समय पर परामर्श लेने से समस्या को गंभीर बनने से रोका जा सकता है। विशेषज्ञों का यह कहना सत्य है कि मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य के समान ही गंभीरता और तत्परता से संबोधित किया जाना चाहिए। अगर मन स्वस्थ नहीं होगा तो तन पर भी उसका असर पड़ेगा। प्राय: कई लोग अपने मन में बोझ लिए घूमते हैं। बचपन के बुरे अनुभव, अपमान, उत्पीड़न, धोखा जैसी घटनाएं मन में घूमती रहती हैं। कभी-कभार ये उस व्यक्ति पर इतनी हावी हो जाती हैं कि उसकी मानसिक शांति भंग हो जाती है। उसका जीवन कई समस्याओं से घिर जाता है। इस स्थिति को टालने के लिए एक तरीका यह हो सकता है कि वह व्यक्ति अपनी बात किसी से साझा करे। हालांकि इसमें भारी जोखिम है। अगर भविष्य में दोनों में मनमुटाव हो गया तो गोपनीयता भंग हो सकती है। यूरोप में मानसिक स्वास्थ्य पर शोध और उसमें सुधार के लिए कई प्रयोग हो रहे हैं। उनमें एक प्रयोग बहुत असरदार पाया गया, जिसके तहत लोग अपने मन का बोझ लिखकर या बोलकर साझा कर सकते हैं। इसमें उनकी गोपनीयता का ध्यान रखा जाता है।

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भारत में मानसिक स्वास्थ्य की कितनी उपेक्षा की जाती है, इसका अंदाजा विशेषज्ञों के इस कथन से लगाया जा सकता है, 'मानसिक स्वास्थ्य विकार का आसानी से उपचार हो सकता है, फिर भी अधिकांश मरीज चुपचाप पीड़ा सहते रहते हैं। 80 प्रतिशत से अधिक लोगों को समय पर मनोरोग संबंधी देखभाल न मिलना, लांछन, जागरूकता की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के अपर्याप्त एकीकरण को दर्शाता है।' हाल के वर्षों में थोड़ी जागरूकता जरूर आई है। अब कुछ लोग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को समग्र स्वास्थ्य का हिस्सा मानते हैं। स्कूलों में शारीरिक दंड, अपमान और उत्पीड़न की शिकायतों की ओर ध्यान दिया जाने लगा है। जयपुर में तो एक मशहूर स्कूल की मान्यता तक रद्द कर दी गई। हालांकि वर्तमान में किए जा रहे उपाय काफी नहीं हैं। इन पर और गंभीरता से काम करने की जरूरत है। बचपन के बुरे अनुभव बाद में भयावह रूप ले सकते हैं। एक लेखक, जो बचपन से ही एकांतप्रिय रहे हैं और किताबें पढ़ने में बहुत रुचि रखते हैं, का संयुक्त परिवार था। एक बुजुर्ग का उनके प्रति बर्ताव बहुत बुरा था। जब वे उस बालक को पढ़ाई करते देखते तो खरी-खोटी सुनाते। जब बालक स्कूल जाता तो उसे रोक कर कहते कि जाओ, पहले मेरा यह काम करो। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने वार्षिक परीक्षा के दिन बालक को स्कूल जाने से रोकना चाहा। यह सिलसिला चलता रहा। इस दौरान बालक भी बड़ा हो गया। उसकी समझ विकसित हो गई। एक दिन जब वह क्लास टेस्ट के लिए जा रहा था तो उस बुजुर्ग के खिलाफ अपनी जेब में 'राष्ट्रपति के नाम पत्र' लिखकर रख लिया। उस दिन बुजुर्ग ने रास्ता नहीं रोका, अन्यथा वह बालक स्कूल न जाकर डाकघर जाता और पत्र भेज देता। इसके नतीजे में घर पर पुलिस आती और बुजुर्ग के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती। वे लेखक उस उत्पीड़न को आज तक नहीं भुला पाए। इससे उन्हें कई मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। उन्हें अच्छी सीख देकर अनुशासित करना चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कोई व्यक्ति हाथ धोकर उनके पीछे ही पड़ जाए। कई बार ऐसी घटनाओं के बहुत खतरनाक नतीजे निकलते हैं, जिनके बाद पछतावा ही शेष रहता है।

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