यह खामोशी क्यों?

भारत में सबके लिए धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के किसी प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है

यह खामोशी क्यों?

पाक में गुरुद्वारे पर कट्टरपंथियों ने ताला जड़कर जबरन कब्जा जमा रखा है

अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर विदेश विभाग की वार्षिक रिपोर्ट की घोषणा के साथ यह कहना कि वह 'भारत ... को सभी की धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता पर कायम रहने के लिए प्रोत्साहित करता रहेगा', पर ध्यान देना जरूरी है। भारत में सबके लिए धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के किसी प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है। 

धार्मिक स्वतंत्रता हमारी संस्कृति का अनिवार्य अंग है। यहां तो शास्त्रार्थ की परंपरा रही है, जिसमें दिग्गज ऋषियों-मनीषियों के दृष्टिकोण को जनसाधारण भी चुनौती दे सकते थे। भारतीय संस्कृति के मूल में उदारता विद्यमान है, जहां विभिन्न कालखंडों में ज्ञान, भक्ति और कर्म से लेकर अनेकानेक मार्गों, पद्धतियों से लोगों ने साधना, आराधना की और ब्रह्म के साथ एकाकार हो गए। सनातन धर्म में तो ऐसी कोई अवधारण ही नहीं है, जो किसी और पर थोपी जाए तथा उसे मानने के लिए बाध्य करे। 

भारतवासियों को इस उदारता से कहीं-कहीं हानि भी हुई, जो उन्होंने उदार हृदय से ही स्वीकार की और आगे बढ़ गए। इसलिए अमेरिकी 'प्रोत्साहन' की बात यहीं खारिज हो जाती है। हां, अमेरिका धार्मिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहन देने के लिए इतना ही प्रतिबद्ध है तो अपने पुराने 'सहयोगी' पाकिस्तान का रुख करे। उसे विनम्र शब्दों में समझाए, रवैया बदलने के लिए दबाव डाले। फिर भी न सुधरे तो आर्थिक व सैन्य सहायता बंद करे। 

पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की क्या स्थिति है, यह इसी से समझ सकते हैं कि इन दिनों लाहौर स्थित गुरुद्वारा शहीद गंज भाई तारू सिंह पर अपना जायज कब्जा पाने के लिए सिक्ख समाज सरकारी दफ्तरों, कचहरियों के चक्कर लगा रहा है और कहीं सुनवाई नहीं हो रही है। इस गुरुद्वारे पर कट्टरपंथियों ने ताला जड़कर जबरन कब्जा जमा रखा है।

आश्चर्य होता है कि ऐसी घटनाओं पर कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन आदि देशों में रहने वाले कई खालिस्तान समर्थक चुप्पी साधे हुए हैं। वे भारत की आलोचना और दुष्प्रचार का कोई मौका नहीं छोड़ते, जबकि यहां हर धर्म के अनुयायियों को पूरी स्वतंत्रता है। सिक्ख धर्म के गुरुओं का भारत में बहुत सम्मान है। उनकी शिक्षाओं, उपदेशों और बलिदानों को नहीं भुलाया जा सकता। दु:खद है कि जब बंटवारा हुआ तो सिक्ख धर्म से संबंधित कई ऐतिहासिक स्थान और गुरुद्वारे पाकिस्तान के हिस्से में चले गए। 

करतारपुर साहिब गुरुद्वारा, जो सरहद के बिल्कुल नजदीक है, अगर पूर्ववर्ती सरकारों ने कुछ और दूरदर्शिता दिखाई होती तो आज स्थिति कुछ और होती। सिक्ख समाज को वहां धार्मिक आराधना के लिए लंबी कागजी कार्यवाही से नहीं गुजरना होता। पाक के पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा के कार्यकाल में करतारपुर कॉरिडोर जरूर बनाया गया, लेकिन इसके पीछे असल मंशा पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह जाहिर कर चुके हैं। पाकिस्तान एक बार फिर खालिस्तान की आग भड़काने का मंसूबा रखता है, इसलिए पंजाब उसके निशाने पर है। यहां सरहद पर आए दिन उसके ड्रोन मंडराते रहते हैं। 

क्या यह साबित करने के लिए काफी नहीं कि खालिस्तान के पीछे पाक का एजेंडा क्या है और आज असल मायनों में धार्मिक स्वतंत्रता के 'प्रोत्साहन' की जरूरत किसे है? पाकिस्तान में शुरू से ही, या उससे भी कुछ पहले, सिक्खों का दमन शुरू हो गया था, जो आज तक जारी है। वहां कितनी ही सिक्ख बेटियों का जबरन धर्मांतरण हो चुका है। ऐसे कई गुरुद्वारे हैं, जहां पहले अरदास होती, लंगर लगता था, लेकिन अब वहां दुकानें खुल चुकी हैं और ऐसी चीजें भी बेची जा रही हैं, जिन्हें सिक्ख धर्म में वर्जित माना गया है। इतने पर भी हर अंतरराष्ट्रीय संस्था खुलकर कहने से बचती है और विदेशों में खालिस्तान समर्थक तत्त्व कोई धरना तक नहीं देते। 

यह चुप्पी ... यह खामोशी ... यह सन्नाटा ... आखिर क्यों? जो ऊर्जा भारत को कोसने में लगाई, अगर वह पाक को 'सुधारने' में लगाई होती तो वहां किसी सिक्ख बेटी का जबरन धर्मांतरण न होता, आज लाहौर के सिक्ख अपना गुरुद्वारा पाने के लिए यूं दफ्तरों, कचहरियों के चक्कर न लगाते; ये गुरुद्वारे भारत में होते और देशभर से श्रद्धालु यहां मत्था टेकने आते।

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