तीसरे मोर्चे की हवा से उलझा कांग्रेस का गणित, अधूरी रही प्रचंड बहुमत की उम्मीद

तीसरे मोर्चे की हवा से उलझा कांग्रेस का गणित, अधूरी रही प्रचंड बहुमत की उम्मीद

सचिन पायलट एवं अशोक गहलोत

जयपुर। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और भाजपा से बगावत कर मैदान में उतरे कई प्रत्याशियों ने तीसरे मोर्चे की आवाज बुलंद की थी। इसके अलावा हनुमान बेनीवाल ने कई जगह सभाएं कर ऐलान किया था कि अब जनता को कांग्रेस और भाजपा से हटकर अन्य विकल्प पर विचार करना चाहिए। हालांकि तीसरे मोर्चे के तौर पर ताल ठोकने वाले ऐसे ज्यादातर प्रत्याशी हार गए लेकिन जो जीते हैं, उनकी तादाद कांग्रेस और भाजपा को मंथन के लिए मजबूर कर देती है।

इस बार बसपा के 6, सीपीएम के 2, निर्दलीय 13 और अन्य के 6 प्रत्याशी जीते हैं। अन्य में रालोद, रालोपा और बीटीपी शामिल हैं। हनुमान बेनीवाल ने कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ खूब बयान दिए थे। वे स्वयं खींवसर से जीत गए। इसके अलावा मेड़ता और भोपालगढ़ से उनके ​प्रत्याशी जीते हैं। यह तादाद उतनी तो नहीं है जितनी कि हनुमान बेनीवाल अक्सर अपनी जनसभाओं में कहा करते थे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस को खासा नुकसान पहुंचाया है।

अगर हनुमान बेनीवाल का असर न होता तो कांग्रेस आसानी से बहुमत का आंकड़ा पार कर सरकार बना सकती थी। रालोपा ने जाट बहुल सीटों पर कांग्रेस के वोटों में बंटवारा किया। इसका कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा। रालोपा ने 58 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी को जाटों के अलावा मुसलमानों का भी वोट मिला है। रालोपा के तीन उम्मीदवार जनता की दूसरी सबसे बड़ी पसंद बनकर उभरे हैं। इससे कांग्रेस का गणित उलझ गया। अब तीन सीटें जीतने से पार्टी कार्यकर्ता उत्साहित हैं और वोटों के आंकड़े को लोकसभा चुनाव में बढ़ाना चाहते हैं। बेनीवाल ने चुनाव से कुछ दिन पहले ही पार्टी को मैदान में उतारा था।

दूसरी ओर बसपा राजस्थान में एक बार फिर उभरकर सामने आई है। उसके प्रत्याशी उदयपुरवाटी, तिजारा, किशनगढ़ बास, नगर, नदबई और करौली से जीते हैं। नतीजों के बाद मायावती ने घोषणा की थी कि यदि सरकार बनाने के लिए जरूरत पड़ी तो बसपा विधायक कांग्रेस को समर्थन देंगे। वहीं सीपीएम ने भादरा और डूंगरगढ़ सीटों पर अपनी ताकत का अहसास कराया है। स्पष्ट है कि राजस्थान में तीसरे मोर्च की हवा ने कांग्रेस का गणित बिगाड़ दिया और सुई 99 पर जाकर अटक गई। हालांकि भरतपुर सीट पर रालोद के साथ गठबंधन हुआ था, जहां प्रत्याशी जीत गया।

विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अब लोकसभा के लिए कयासों का दौर शुरू हो गया है। अगर कांग्रेस और भाजपा से हटकर अन्य दल एक बार फिर मैदान में उतरेंगे तो ये मुकाबले को बेहद मुश्किल बना देंगे। सामाजिक समीकरणों की वजह से कई सीटों के नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं।

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