भ्रमित और कुंठित ट्रंप

ट्रंप को कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है

भ्रमित और कुंठित ट्रंप

ईरान ने करारा जवाब दिया

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भारत के बारे में जो टिप्पणी की, वह अत्यंत निंदनीय है। उनका एक-एक शब्द यह गवाही दे रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। अगर उन्हें समय रहते मर्यादा में नहीं रखा गया तो वे दुनिया को किसी बड़ी मुसीबत के मुंह में धकेल सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ईरान पर हमला करने के बाद ट्रंप को कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। अगर वे पीछे हटेंगे तो इसे उनकी करारी हार माना जाएगा। अगर वे आगे बढ़ेंगे तो उन पर ईरानी जनता की हत्या के गंभीर आरोप लगेंगे। ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार के लिए लालायित हैं। उन्होंने दर्जनों मनगढ़ंत दावे कर अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन दाल नहीं गली। ईरान पर बड़ा हमला करने के बाद उनका दावा भी खटाई में पड़ गया है। उनके शब्दों से गहरा गुस्सा झलक रहा है। वे कुंठित नजर आ रहे हैं। उन्होंने सोचा होगा कि ईरान दो-चार दिनों में ही घुटनों पर आ जाएगा, लेकिन उसने ऐसा करारा जवाब दिया कि अमेरिकी राष्ट्रपति की हालत सांप-छछूंदर जैसी हो गई है। अब वे जन्मजात नागरिकता का मुद्दा उठाकर भारत के बारे में अनुचित टिप्पणी कर रहे हैं। अगर ट्रंप को अमेरिका स्वर्ग और अन्य देश नरक लगते हैं तो अमेरिकी राष्ट्रपति वहां क्यों जाते हैं? क्यों उन देशों से संबंध रखते हैं? अपने देश तक सीमित रहें और 'स्वर्गवासी' कहलाएं। ट्रंप ज्यादातर समस्याओं का एक ही समाधान जानते हैं। वह है- टैरिफ! उन्हें ऐसा लगता है कि टैरिफ वह चाबुक है, जिसे फटकारने भर की देर है। उसके बाद दुनिया सीधे रास्ते पर आ जाएगी।

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अगर अमेरिका इतना महान देश है तो डोनाल्ड ट्रंप अब तक रूस-यूक्रेन युद्ध क्यों नहीं रुकवा पाए? अमेरिका की इतनी ज्यादा धाक है तो वह उत्तर कोरिया के किम जोंग उन के आगे क्यों फेल हो गई? अगर अमेरिकी राष्ट्रपति खुद को सर्वशक्तिमान समझते हैं तो ईरानी नेतृत्व को क्यों नहीं झुका पाए? ट्रंप की बेतुकी बयानबाजी सुनकर लगता है कि 'थोथा चना, बाजे घना' वाली कहावत यूं ही नहीं बनाई गई है। ट्रंप की हालत उस ईर्ष्यालु छात्र जैसी है, जो पढ़ना नहीं चाहता, लेकिन कक्षा में प्रथम आना चाहता है और पुरस्कार पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। ट्रंप पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कट्टर आलोचक हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। वे ओबामा से पीछे नहीं रहना चाहते। उनका सपना है कि दुनिया उन्हें 'शांति पुरुष' के रूप में याद करे और ओबामा से ज्यादा योग्य समझे। जब कभी उन्हें महसूस होता है कि 'शांति पुरुष' कहलाने की संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं तो भड़क जाते हैं और उल्टे-सीधे बयान देने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति की मानसिक स्थिति क्या होगी, जो एक दिन किसी देश को महान बताकर उसके प्रधानमंत्री को अपना सबसे अच्छा मित्र बताए और अगले दिन उस देश को नरक घोषित कर दे? ट्रंप के इस बयान को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है। लोगों को अमेरिका जाने का मोह छोड़कर अपने देशों को महान बनाना चाहिए। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार समेत सभी सुविधाएं अपने देशों में भी पैदा की जा सकती हैं। इसके लिए सरकारें इच्छाशक्ति दिखाएं। विदेश जाकर अपमान झेलने से कई गुना बेहतर है अपने देश की रोटी; भले ही रूखी-सूखी हो, लेकिन अपनी मिट्टी और अपने पसीने की हो।

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