आस्था का सम्मान

सनातन धर्म पर सदियों से हमले हो रहे हैं

आस्था का सम्मान

हर धर्म, उसके ग्रंथों और प्रतीकों का सम्मान होना चाहिए

कला और मनोरंजन के नाम पर फिल्मों में अश्लीलता और धार्मिक प्रतीकों का अपमान अत्यंत चिंता का विषय है। विशेष रूप से सनातन धर्म, अवतारों और देवी-देवताओं के गलत फिल्मांकन का जो सिलसिला चल पड़ा है, उस पर लगाम लगाने के लिए ठोस कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है। आश्चर्य की बात है कि ऐसी फिल्मों को सेंसर बोर्ड अनुमति दे देता है! 

हाल में आई फिल्म 'आदि पुरुष' ने तो मर्यादा को ताक पर रख दिया है। शुरुआत में इस फिल्म ने अच्छी कमाई की, क्योंकि लोगों को आशा थी कि इसमें प्रभु श्रीराम के आदर्शों की झलक देखने को मिलेगी, लेकिन इसके निर्माता, संवाद लेखक ने निराश ही किया। अब मामला न्यायालय में चला गया है, जहां से उन्हें फटकार मिल रही है। 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 'आदि पुरुष' के निर्माता और संवाद लेखक को नोटिस भेजा है। न्यायालय ने भगवान श्रीराम और भगवान हनुमान सहित धार्मिक पात्रों को आपत्तिजनक तरीके से प्रस्तुत करने को लेकर इनकी आलोचना भी की है। 

सनातन धर्म पर सदियों से हमले हो रहे हैं। उपनिवेश काल में ऐसी किताबें और पत्रिकाएं खूब प्रकाशित की गईं, वहीं आजादी के बाद सिनेमा के जरिए निर्माताओं ने जब-तब ऐसी फिल्में बनाईं, जिनके जरिए सनातन के प्रतीकों का अपमान किया गया, उनकी हंसी उड़ाई गई। इसके बावजूद समाज सहिष्णुता का परिचय देता रहा। 

इससे ऐसे फिल्म निर्माताओं, संवाद लेखकों, अभिनेताओं ने आस्था का अपमान करने में और तेजी दिखाई। फिल्म 'पीके' में किस तरह सनातन धर्म का मजाक उड़ाया गया था! ये निर्माता, संवाद लेखक और अभिनेता भलीभांति जानते हैं कि अगर वे ऐसा प्रयोग सनातन से हटकर करेंगे तो उन्हें लेने के देने पड़ जाएंगे।

निस्संदेह हर धर्म, उसके ग्रंथों और प्रतीकों का सम्मान होना चाहिए। सनातन संस्कृति तो यही सिखाती है। पहले गांवों में रामलीला का मंचन होता था तो ग्रामीणों के पास नाममात्र की सुविधाएं होती थीं। गांवभर से चीजें जुटाकर आयोजन होता था। रामलीला में एक पात्र का काम हास्य उत्पन्न करना ही होता था, लेकिन जितने दिन भी आयोजन होता, एक शब्द भी ऐसा सुनाई नहीं देता, जिसमें प्रभु श्रीराम, माता सीताजी, लक्ष्मण, हनुमान ... के बारे में कोई अशोभनीय बात हो। रामलीला के उन पात्रों में लोग भगवान की छवि देखते थे। 

आज फिल्म निर्माता करोड़ों रुपए खर्च कर फिल्म बनाते हैं। उनमें आधुनिक तकनीक के नए-नए प्रयोग करते हैं, लेकिन बात जब धार्मिक प्रतीकों के फिल्मांकन की हो तो प्राय: अध्ययन और शोध का अभाव होता है, जो पर्दे पर साफ झलकता है। 

'आदि पुरुष' को भी रामायण से प्रेरित बताया जा रहा है, जबकि उसके पात्रों से ऐसे संवाद सुनने को मिल रहे हैं, जो रामायण से मेल नहीं खाते। विशेष रूप से एक दृश्य में हनुमानजी को लंका के बारे में जो संवाद बोलते दिखाया गया, वह हैरान करने वाला है। रामायण में हनुमानजी ऐसी भाषा कहीं नहीं बोलते। फिर संवाद लेखक ने ऐसे संवाद क्यों लिखे? 

स्पष्ट है कि या तो संवाद लेखक को रामायण का ज्ञान नहीं है या उन्होंने आधे-अधूरे ज्ञान से जानबूझकर ऐसे संवाद लिखे, जो आपत्तिजनक हैं। उनका पूरा ध्यान इस बात पर था कि किस तरह दर्शकों से ज्यादा से ज्यादा तालियां बटोरी जाएं। निर्माता की सहमति के बिना ऐसे संवाद लिखना संभव नहीं है। क्या वे भूल गए थे कि पर्दे पर किसे दिखा रहे हैं? 

हनुमानजी जन-जन के आराध्य हैं। वे बल, बुद्धि और विद्या से संपन्न हैं। उनका किरदार निभाने वाले पात्र के मुख से ग़लत-सलत संवाद सुनकर लोगों में आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। इसको लेकर वे न्यायालय गए हैं, जहां मामले की सुनवाई हो रही है। आशा है कि इससे शिक्षा लेकर फिल्म निर्माता, संवाद लेखक और अभिनेता मर्यादा का पालन करना सीखेंगे और भविष्य में जनभावना और आस्था का सम्मान करेंगे।

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