आतंक का कहर

आतंक का कहर

मिस्र ही नहीं, कई देशों में लंबे समय से आतंकी हमले हो रहे हैं लेकिन मिस्र में सिनाई की मस्जिद पर हुए हमले ने ब़डा कहर बरपाया है। यह मिस्र में अब तक का सबसे ब़डा हमला था। हमले में ३०५ लोग मारे गए, जिनमें २७ बच्चे थे। सेना की वर्दी में आए कोई २५-३० हमलावरों ने पहले तो मस्जिद पर बमों से धावा बोला और फिर जान बचाने भाग रहे लोगों पर मशीनगनों से फायरिंग की। जाहिर है वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारने का इरादा रखते थे और उन्होंने ऐसा ही किया। यह बर्बरता की हद ही है। हमले की जिम्मेदारी आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) ने ली है। जांच अधिकारियों ने भी माना है कि हमलावरों के हाथों में आईएस का झंडे थे। राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सीसी ने इस हमले का बदला लेने का संकल्प लिया है। सेना ने जवाबी कार्रवाई में कट्टरपंथियों के ठिकानों पर हवाई हमले किए। यह हमला बदलते मिस्र की सरकार के समक्ष एक ब़डी चुनौती है। हमला उस वक्त हुआ है, जब आईएस की इराक और सीरिया में पक़ड कमजोर प़डी है। अब सीधी ल़डाई की बजाय आईएस आतंकवादी कार्रवाई पर उतर आया है। शायद इस तरह के हमलों को अंजाम देकर वह अपने समर्थकों तक यह संदेश पहुंचाने का इरादा रखता है कि वह अभी भी सक्रिय है और उसकी दुश्मनों से ल़डने की क्षमता बरकरार है। गौरतलब है कि मिस्र के राष्ट्रपति ने कट्टरपंथियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया हुआ है। माना जा रहा है कि उसका बदला लेने के लिए ही यह बर्बर हमला किया गया। मिस्र के राष्ट्रपति को आतंकियों के इस प्रकार के किसी इरादे का पहले ही अंदेशा था। कुछ दिनों पहले उन्होंने कहा था कि इराक व सीरिया में कमजोर प़डा आईएस आगे मिस्र को निशाना बना सकता है। उनकी यह आशंका इस हमले से सही साबित हुई है। पर सवाल है कि जब उन्हें संभावित खतरे की आशंका थी तो उससे निपटने के लिए उन्होंने क्या किया? सेना ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की? क्यों आतंकियों से नरमी बरती जा रही थी? क्या सेना और सरकार को बर्बर हमले का इंतजार था? ताजा आतंकी हमले का एक खास पहलू यह है कि हमलावर एक ऐसी मस्जिद को निशाना बनाने आए थे जो सूफी विचारधारा वालों की मानी जाती है। मिस्र में ईसाइयों पर भी कई आतंकी हमले हो चुके हैं। इस साल मई में मध्य मिस्र में कुछ बंदूकधारियों ने ईसाइयों को ले जा रही एक बस को बमों से उ़डा दिया था। इसमें २८ लोग मारे गए थे। फिर अप्रैल में उत्तरी शहर एलेक्जेंड्रिया में एक चर्च के पास हुए दो फिदायीन हमलों में ४६ लोग मारे गए थे। लेकिन अब सूफियों को निशाना बनाया गया है, जो इस्लाम को ही मानते हैं। ऐसे हमलों पर दुनिया अभी भी चुप रही तो उदार व सहिष्णु लोगों का तो जीना ही हराम हो जाएगा। ऐसे हमलों पर इस्लामी देशों को भी चुप नहीं रहना चाहिए।

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