पत्रकारिता पर हमला

पत्रकारिता पर हमला

विश्व स्तर पर वर्ष २०१६ में कुल १२२ पत्रकारों की हत्या की गई जिनमेंे से ९३ को निशाना बनाकर मारा गया था। मंगलवार को बेंगलूरु के राजराजेश्वरी नगर में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश को अपने ही घर के द्वार पर गोलियों से छलनी कर दिया गया। गौरी लंकेश अपनी बेबाक पत्रकारिता के लिए जानी जाती थीं। वे कर्नाटक में पत्रकारिता का निडर और निर्भीक चेहरा थीं। उनके पिता भी ब़डे साहित्यकार रहे। गौरी एक साप्ताहिक ’’गौरी लंकेश पत्रिके’’ की संपादक थीं और इसीके साथ ही वो अखबारों में समय समय पर अपने लेख लिखा करती थीं। गौरी के दक्षिणपंथी संगठनों से वैचारिक मतभेद जगजाहिर थे, और हाल ही में उन्हें अपने एक एक लेख की वजह से मुकदमा भी झेलना प़डा था। भारतीय जनता पार्टी की कर्नाटक इकाई के पूर्व अध्यक्ष प्रह्लाद जोशी द्वारा मानहानि का मुकदमा किया गया था जिसमेें गौरी को सजा भी हुई थी। हालाँकि राज्य और देश के अनेक अग्रणी राजनेताओं ने गौरी की हत्या की क़डी निंदा की है परंतु उनकी विचारधारा को उनकी हत्या से जो़डकर राजनीती भी की जा रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस विषय पर बयान देते हुए कहा है कि भाजपा की विचारधारा का विरोध कर रहे लोगों की जान पर बन आई है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और इस विषय में कर्नाटक सरकार द्वारा अप्रत्यक्ष संकेत दिए जा रहे हैं कि गौरी को दक्षिणपंती संगठनों से खतरा था और उनकी मौत के लिए सम्भवता यही कारण है। चिंता की बात यह है की हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाली पत्रकारिता पर ऐसे हमले लगातार ब़ढने लगे हैं्। हमारे देश में पत्रकारिता को निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के काम करने के लिए जाना जाता रहा है। पिछले दो दशकों में पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी अनेक सवाल उठे हैं परंतु किसी पत्रकार की आवा़ज को दबाने के लिए उसकी हत्या कर देना किसी भी तरह से सही नहीं माना जा सकता है। अधिकांश तौर पर पत्रकारों के निशाने पर सत्ता में बैठे लोग होते हैं्। ताकतवर लोगों को निशाना बनाने की वजह से ही पत्रकारों की दुशमनों की संख्या में वृद्धि होती रहती है। कई बार देखा गया है कि राजनेता कलम के सिपाहियों पर हमले इसलिए करवाते हैं ताकि उनके राजनीतिक सफर में किसी भी तरह का व्यवधान न आये। साथ ही किसी भी पत्रकार पर हुए हमले का फायदा उठाने में भी राजनैतिक दल विलंब नहीं करते हैं्। सच तो यह है कि राजनैतिक दलों को विचार विमर्श कर सरकार के साथ मिलकर ऐसा कानून बनाना चाहिए की देश के चौथे स्तंभ की रक्षा की जा सके। पत्रकारों को अपना काम करने की आ़जादी होनी चाहिए और किसी भी तरह के दबाव से उन्हें मुक्त रखने की ि़जम्मेदारी भी सरकार की ही बनती है।

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