समाज में स्वत्व पैदा करने की आवश्यकता : भागवत

समाज में स्वत्व पैदा करने की आवश्यकता : भागवत

बैतूल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को स्वत्व पर जोर देते हुए कहा कि हमें भाषा, जाति पाति का भेदभाव मिटाकर समाज में पुन: स्वत्व पैदा करने की आवश्यकता है। भागवत ने यहां संघ के त्रिदिवसीय ग्राम विकास कार्यकर्ता सम्मेलन के समापन अवसर उपस्थित कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह बातें कहीं। उन्होंने कहा कि संघ की सभी गतिविधियां समाज परिवर्तन का साधन है। साधारणतया परिवर्तन के नाम पर राज्य व्यवस्था बदल जाती है पर उससे सभी बीमारी ठीक नहीं होती है। उन्होंने कहा कि समाज के स्वभाव में परिवर्तन होना चाहिए पर हमें धर्म आचरण करने वाला समाज बनाना चाहिए।उन्होंने कहा कि हम धर्म को आधार लेकर विश्व कल्याण के लिए चलने वाले लोग हैं। हम भारत के पुत्र-पुत्रियां है, यह भाव भूल गए, इसलिए विखंडन हुआ। भाषा, जाति का भेद हुआ। समाज अपने मूल्यों को भूल गया। इसलिए स्वत्व चला गया। उन्होंने उदाहरण पूर्वक कार्यकर्ताओं को समझाया कि जब राजपाट प्रह्लाद के पास आ गया तो इंद्र उनके पास गए। प्रह्लाद दानी थे। फिर भी इंद्र ने प्रह्लाद से राज्य नहीं मांगा। उन्होंने प्रह्लाद से उनका स्वत्व मांगा। भागवत कहा कि अपने देश की कहानी भी ऐसी ही है। हम स्वत्व भूल गए इसलिए हमारा ज्ञान वैभव सब चला गया। हमे समाज में पुनः स्वत्व पैदा करने की आवश्यकता है। इसीलिए संघ के स्वयंसेवकों ने सामाजिक समरसता, धर्म जागरण, ग्राम विकास, कुटुम्भ प्रबोधन, गौरक्षा की गतिविधियां समाज में प्रारम्भ कीं हैं।उन्होंने कहा कि विश्व के देश किसी एक बात को लेकर चलते हैं, लेकिन भारत कृषि, उद्योग, व्यापार तीनों अच्छे चलना चाहिए। तभी व्यवस्था ठीक चलेगी। ये तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि कोई पराया नहीं सब अपना है। किसी का नुकसान हमारा नुकसान। हमारा लाभ सबका लाभ बने यह धर्म दृष्टि समाज की बने। उन्होंने कहा कि अगर उद्देश्य राष्ट्र का परम वैभव है तो रास्ता कोई भी हो उस पर चलेंगे।

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