टूट गया ट्रंप का भ्रम?

ट्रंप और क्या गुल खिलाएंगे?

टूट गया ट्रंप का भ्रम?

क्या ट्रंप ईरान में कोई कठपुतली सरकार बनाना चाहते हैं?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए जा रहे बयानों से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के संबंध में असमंजस की स्थिति पैदा हो रही है। एक ओर वे ईरानी नेतृत्व को बातचीत का न्योता देते हैं, विचित्र दावे करते हैं, दूसरी ओर इस देश के महत्त्वपूर्ण ठिकानों पर बमबारी करते हैं। आखिर, ट्रंप इस संघर्ष के जरिए दुनिया को कहां लेकर जाना चाहते हैं? आज कई देशों में लोग तेल-गैस की किल्लत का सामना कर रहे हैं। मजदूर शहर छोड़कर गांव जा रहे हैं। उनके चेहरों से निराशा टपक रही है। इन सबका जिम्मेदार कौन है? नोबेल शांति पुरस्कार का सबसे बड़ा दावेदार बनने की सनक में ट्रंप और क्या गुल खिलाएंगे? उन्होंने यह कहते हुए सबको चौंका दिया कि 'ईरान के नए शासन के राष्ट्रपति जो अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में कहीं कम कट्टर और कहीं अधिक बुद्धिमान हैं, ने अभी-अभी अमेरिका से युद्धविराम का अनुरोध किया है!' जब ईरान में पहले ही से राष्ट्रपति मौजूद हैं तो नए शासन के राष्ट्रपति कहां से आ गए? क्या ट्रंप ईरान में कोई कठपुतली सरकार बनाकर उसे मान्यता देना चाहते हैं? क्या अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान को 'पाषाण युग' में भेजने की धमकी देकर खुद को सर्वशक्तिमान घोषित करना चाहते हैं? वैसे, ईरान को काफी नुकसान हो चुका है। उसके सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनेई समेत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और आम नागरिक मारे गए हैं। ट्रंप ने हमला शुरू करने से पहले सोचा होगा कि खामेनेई की मौत के बाद ईरान की जनता सड़कों पर उतर आएगी और अमेरिका की जय-जयकार करेगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। ईरान के लोग खामेनेई की नीतियों से नाराज थे। पहले, उन्होंने महंगाई और मुद्रा में भारी गिरावट को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जरूर किया था।

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इससे ट्रंप को भ्रम हुआ कि ईरान की जनता उन्हें अपना उद्धारकर्ता समझेगी। अब बमबारी में कितने लोग अमेरिकी राष्ट्रपति के समर्थन में नारे लगा रहे हैं? अब तक ट्रंप का भ्रम टूट गया होगा। वास्तव में यह पूरा अभियान गलत आकलन पर आधारित था। ईरान में आज भी राष्ट्रवाद जिंदा है। इसके नागरिक बेहतर नेतृत्व तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं कि कोई अमेरिकी कठपुतली उन पर थोप दी जाए। अगर ट्रंप किसी तरह वर्तमान ईरानी नेतृत्व को हटाकर नया नेतृत्व ले आएं तो उसे नागरिकों द्वारा स्वीकार किए जाने की संभावना कम ही है। अगर ईरान को उसके हाल पर छोड़कर सैन्य अभियान बंद कर दिया जाए तो उसे उबरने में वर्षों लगेंगे। इस देश के कई इलाके पूरी तरह तहस-नहस हो गए हैं। नवनिर्माण पर अरबों डॉलर खर्च करने होंगे। युद्ध रुकने का यह मतलब नहीं कि ईरान में जनजीवन तुरंत पटरी पर लौट आएगा। आम नागरिक पहले ही से महंगाई, बेरोजगारी का दंश झेल रहे थे। अब उन्हें इनके साथ जरूरी चीजों की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। इससे जनता में आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। अगर सरकार लोगों का जीवन स्तर बेहतर नहीं कर पाई तो उसके खिलाफ आंदोलन को हवा मिल सकती है। अमेरिका और इज़राइल उसका पूरा फायदा उठाना चाहेंगे। उस स्थिति में कोई ऐसा चेहरा उभरकर सामने आ सकता है, जो ईरान की किस्मत बदलने का वादा करे। उसे पश्चिमी देशों से समर्थन मिल सकता है। निर्वासित 'क्राउन प्रिंस' रेज़ा पहलवी को ऐसा संभावित चेहरा माना जा रहा है। ध्यान रहे, जब उनके पिता की सत्ता थी, तब ईरान के आम लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय शाही परिवार अपने ऐशो-आराम और बड़ी-बड़ी पार्टियों पर बेदर्दी से धन लुटाता था। उससे मुक्ति पाने के लिए क्रांति हुई थी। वर्तमान संघर्ष ने इस देश के लिए बहुत मुश्किल राह खोल दी है। ईरान के लिए यह स्वाभिमान की लड़ाई है। अमेरिका अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है। वहीं, इज़राइल के लिए यह अस्तित्व बचाने का संघर्ष है।

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