क्या ऐसे बनेंगे विश्वगुरु?

भारत अपनी समस्याएं जानता है

क्या ऐसे बनेंगे विश्वगुरु?

यह कहना बहुत आसान है कि भारत में कुछ नहीं बदला

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की यह टिप्पणी कि 'देश को विश्वगुरु बनना था, लेकिन वह तो विश्वचेला बन गया', निंदनीय है। आजकल कई नेता और अन्य लोग इसी टिप्पणी को दोहरा रहे हैं। इन्हें अपने देश को दूसरों से कमजोर साबित करने में क्या आनंद आता है? स्वस्थ आलोचना करनी चाहिए। इसका हमेशा स्वागत होना चाहिए, क्योंकि यह हमें बेहतर बनने में मदद करती है। वहीं, बार-बार खुद की क्षमता पर संदेह करने, हमेशा नकारात्मक सोचने से कोई बेहतरी नहीं आती। भारत किसी समय विश्वगुरु था। तब नालंदा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में देश-विदेश के विद्यार्थी अध्ययन करते थे। आज ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पश्चिमी देशों का दबदबा है। भारत के सामने कई चुनौतियां हैं, लेकिन वह लगातार आगे बढ़ रहा है। इस देश ने डिजिटल पेमेंट, अंतरिक्ष अनुसंधान समेत कई क्षेत्रों में शानदार प्रदर्शन कर दुनिया को अचंभित किया है। भारत अपनी समस्याएं जानता है। यहां लोगों के जीवन स्तर में सुधार के लिए बहुत प्रयास करने होंगे। अगर इसके साथ देश विश्वगुरु बनने का लक्ष्य रखता है तो इसमें क्या बुराई है? क्या हमें सदैव अपनी समस्याएं गिनाते रहना चाहिए? क्या हम इससे विश्वगुरु बन जाएंगे? भगवंत मान कहते हैं, 'देश को आजाद हुए करीब 80 साल हो चुके हैं, लेकिन अब भी बुनियादी समस्याएं जस की तस हैं। ... विदेशों में लोग मंगल ग्रह पर जाने की बात कर रहे हैं, जबकि हम शहरों में सीवर के ढक्कन तक नहीं लगा पाए हैं।' अगर तथ्यों की बात करें तो पंजाब के मुख्यमंत्री ने ज्यादा गलत नहीं कहा है। भारत में समस्याएं तो हैं, लेकिन 'जस की तस' नहीं हैं। जिन्होंने साठ और सत्तर का दशक देखा है, उनसे पूछें, 'उस समय खाद्यान्न की क्या स्थिति थी?' आज भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है। हमारे किसान कई देशों के पेट भर सकते हैं।

Dakshin Bharat at Google News
जिन्होंने अस्सी का दशक देखा है, उनसे पूछें, 'उस समय टेलीफोन का कनेक्शन कैसे मिलता था और कितने दिनों में मिलता था? सीमेंट कैसे मिलती थी? अगर ब्याह-शादी होती तो चीनी की एक बोरी लेने के लिए कितनी जगह धक्के खाने पड़ते थे?' उनसे पूछें, 'उस समय किसी को स्कूटर खरीदना होता तो क्या प्रक्रिया थी? अच्छी कलाईघड़ी लेने जाते तो कितने दिन बाद नंबर आता था? बैंकों की क्या स्थिति थी? कितने आम लोग बैंकों में अपने खाते खुलवा सकते थे? अगर शहर में नौकरी कर रहा कोई व्यक्ति गांव में अपने मां-बाप को रुपए भेजता तो कितने दिन लगते थे और क्या शुल्क था? जब कभी बाढ़-अकाल के हालात होते और केंद्र सरकार आम लोगों को आर्थिक सहायता भेजती तो बिचौलिए कितना हिस्सा डकार जाते थे?' यह कहना बहुत आसान है कि भारत में कुछ नहीं बदला, समस्याओं का ढेर लगा हुआ है। वास्तव में ऐसा नहीं है। नब्बे के दशक तक टेलीफोन आम आदमी की पहुंच से दूर था। साइकिल खरीदने से पहले दस बार सोचना पड़ता था। कई अच्छे धारावाहिकों से करोड़ों लोग इसलिए वंचित रह गए, क्योंकि उनके पास टीवी नहीं था। अक्सर चीजों की किल्लत बनी रहती थी। लोग इसके अभ्यस्त हो गए थे। क्या आज वैसी स्थिति है? नहीं, भारत बहुत आगे बढ़ चुका है, कई गुणा बेहतर स्थिति में है। बतौर मुख्यमंत्री, भगवंत मान के पास कई अधिकार और शक्तियां हैं। उन्होंने पंजाब का कितना विकास कर दिया? क्या वहां के स्कूल अमेरिका-चीन के स्कूलों को टक्कर देने लगे हैं? क्या पंजाब से बेरोजगारी दूर हो गई है? क्या उन्होंने युवाओं को नशे से निजात दिला दी है? याद करें, वे दृश्य जब अमेरिका से कई भारतीय नागरिक अपमानजनक तरीके से स्वदेश भेजे गए थे। उनमें कितने लोग पंजाब से थे? क्या पंजाब से अब लोग विदेश जाने के लिए गलत तरीके नहीं अपना रहे हैं? अपने देश की व्यवस्थाओं से जुड़ीं कमियां गिनाना आसान है। यह तो हर कोई कर सकता है। जिन लोगों के पास शासन से जुड़े अधिकार हैं, उन्हें कोरी बातें बनाने से पहले कुछ करके दिखाना चाहिए।

About The Author

Dakshin Bharat Android App Download
Dakshin Bharat iOS App Download