समरसता से बनाएं सशक्त भारत
यह देश एक भयंकर सुनामी से बच गया
यूजीसी के नियम एकतरफा थे
यूजीसी को उच्चतम न्यायालय से बहुत बड़ा झटका लगा है। यह लगना ही था। उसने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव को रोकने के लिए जो नियम लागू किए थे, उनमें भारी विरोधाभास था। न्यायालय ने इन पर रोक लगाकर देश को अनर्थ से बचा लिया। ये नियम सामाजिक समरसता के लिए खतरा थे। इनके जरिए एक बड़े वर्ग के साथ अन्याय होने की पूरी आशंका थी। न्यायालय के कारण यह देश एक भयंकर सुनामी से बच गया। अगर यूजीसी के उक्त नियम लागू रहते तो कुछ ही दिनों में ऐसे दृश्य देखने को मिलते, जिनकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। जिन लोगों पर नियम बनाने की ज़िम्मेदारी थी, वे इतने ग़ैर-ज़िम्मेदार कैसे हो सकते हैं? उन्होंने यह आकलन नहीं किया था कि इनका सर्वसमाज पर क्या असर पड़ेगा? क्या विदेशी आक्रांताओं ने हमें कम बांटा था, जो अब युवाओं के मन में सामाजिक विभाजन के बीज बोने चले थे? इन नियमों की शब्दावली साफ बताती है कि ये एकतरफा हैं। लिखने वाले ने दूसरे पक्ष के बारे में सोचा ही नहीं होगा। अगर ऐसा सोच-समझकर लिखा गया था तो यह एक बहुत बड़ी साजिश थी। देश के युवाओं को ऐसे खतरनाक प्रयोगों से बख्श दें। एक सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी इन नियमों को पढ़कर बता सकता है कि ये भेदभाव को कम नहीं करेंगे, बल्कि बढ़ाएंगे। क्या ज़िम्मेदारों ने यह सोचा था कि 'हम नियम बनाकर थोप दें, देश के युवा भुगतते रहें'? इन नियमों से कितनी समानता आई, यह देखने के लिए यूजीसी के अधिकारी महाविद्यालयों में जाकर देखें। इतने दिनों में ही विद्यार्थी कई गुटों में बंट गए, वे एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखने लगे। क्या हम ऐसे महाशक्ति बनेंगे? जब युवा शक्ति ही बिखरने लगी तो राष्ट्र कैसे शक्तिशाली बन सकता है? ध्यान रहे, फिर यह सिलसिला यहीं नहीं थमता। लोग मोहल्लों, कार्यस्थलों, सार्वजनिक स्थानों पर भी जातियों में बंटकर रहते।
यूजीसी के ये नियम दुर्भावना को बढ़ावा देते। इनसे ब्लैकमेलिंग, उत्पीड़न और शोषण के नए-नए रास्ते खुल जाते। इनसे उद्दंड प्रवृत्ति के विद्यार्थियों को एक खतरनाक हथियार मिल जाता। वे इनका जमकर फायदा उठाते। इन नियमों की वजह से सामान्य वर्ग की युवतियों का पढ़ना-लिखना मुश्किल हो जाता। किसी प्रेम प्रस्ताव को ठुकराने का बदला जातिगत भेदभाव का झूठा आरोप लगाकर लिया जा सकता था। उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई की जगह शिकायतों की झड़ी लग जाती, क्योंकि झूठा आरोप लगाने वाले आजाद घूमते। उन्हें सजा का कोई डर ही न रहता। सोचिए, यूजीसी के इन नियमों से कैसा भारत बनता? क्या युवाओं के मन में प्रतिशोध का विष घोलकर देश सुरक्षित रहता? ऐसी स्थिति में बाहरी दुश्मन की जरूरत नहीं पड़ती। लोग ही एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते। उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग एक बड़ी समस्या है। इसके कारण कई विद्यार्थी जान गंवा चुके हैं। सोचिए, अगर कोई खुराफाती छात्र इन नियमों का इस्तेमाल कर किसी को फंसाता तो क्या होता? पीड़ित छात्र निर्दोष होने की कसमें खाता और खुद ही शोषक कहलाता। ये नियम समाज को आगे लेकर नहीं जाते, बल्कि अंधकार के युग में धकेल देते। हमने हाल में 77वां गणतंत्र दिवस मनाया है। इतने वर्षों में देशवासियों में बहुत जागरूकता आई है। जातिगत भेदभाव बहुत कम हो गया है। जातिवाद की दीवार ढह चुकी है। उसके कुछ चिह्न जरूर बचे हैं, जो एक-डेढ़ दशक में लुप्त हो सकते हैं। उक्त नियम विद्यार्थियों के बीच जातिवाद की एक ऊंची दीवार खड़ी कर देते। लोग दोस्ती करने से पहले एक-दूसरे की जाति पूछते। क्या इससे सामाजिक न्याय मिलता? समरसता बढ़ती? राष्ट्रीय एकता मजबूत होती? कोई भी नियम-कानून बनाने से पहले याद रखें- यह देश हम सबका है। सब मिलकर रहेंगे तो उन्नति करेंगे। अगर आपसी विश्वास की डोर तोड़ेंगे तो देश कमजोर होगा। कई शक्तियां इसी ताक में बैठी हैं कि भारत कमजोर हो तो वे अपने मंसूबे पूरे करें। उन्हें तालियां बजाने का मौका न दें। समरसता से सशक्त भारत बनाएं।

