पाक को ऐसे करें बेनकाब

पाकिस्तान में हिंदुओं से ज्यादा नफरत अहमदिया समुदाय से की जाती है

पाक को ऐसे करें बेनकाब

अहमदिया से भी ऊपर यहूदियों का नंबर आता है

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के दमन का मुद्दा संरा महासभा में उठाकर इस पड़ोसी देश को मुंहतोड़ जवाब दिया है। पाकिस्तान हर मंच पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करते हुए मानवाधिकारों का उपदेश देता है, लेकिन अपने नागरिकों का उत्पीड़न करता है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पाकिस्तान में हिंदुओं से ज्यादा नफरत अहमदिया समुदाय से की जाती है। उन्हें परेशान करने के लिए सरकार और कट्टरपंथी संगठन नए-नए बहाने ढूंढ़ते रहते हैं। इस वजह से अहमदिया समुदाय के लोग अपनी पहचान छिपाने को मजबूर हैं। नफरत की इस सूची में अहमदिया से भी ऊपर यहूदियों का नंबर आता है। ताज्जुब की बात है कि पाकिस्तानियों ने अपने देश में शायद ही किसी यहूदी को देखा होगा। किसी को याद नहीं होगा कि कब उनका कोई पड़ोसी यहूदी था! इसके बावजूद यहूदियों से खूब नफरत की जाती है। पाकिस्तान की सरकारों, नेताओं, सेना, एजेंसियों और कट्टरपंथियों ने यहूदियों को लेकर मन में इतना जहर भर दिया है कि आम पाकिस्तानी उन्हें अपना जन्मजात दुश्मन समझता है। जब नफरत का बीज बोया जाता है तो वही फल मिलता है, जो आज पाकिस्तान को मिल रहा है। चूंकि यहूदी पाकिस्तान में हैं नहीं, इसलिए कट्टरपंथी ताकतें कभी हिंदुओं को, तो कभी अहमदियों को निशाना बनाती रहती हैं। पिछले साल अप्रैल में कराची में एक उग्र भीड़ ने अहमदिया समुदाय के उपासना स्थल पर हमला किया और एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। उस वारदात में टीएलपी नामक कट्टरपंथी संगठन का हाथ बताया गया था।

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पिछले साल मई में एक मशहूर डॉक्टर, जो सरगोधा में अपना अस्पताल चलाते थे, को गोली मार दी गई थी। वजह थी- डॉक्टर अहमदिया समुदाय से थे। अक्टूबर में एक और अहमदिया उपासना स्थल पर तीन बंदूकधारियों ने हमला किया था। इससे कई लोग घायल हुए थे। पाकिस्तान में अक्सर अहमदिया लोगों के खिलाफ झूठे आरोपों में एफआईआर दर्ज करवा दी जाती है। किसी को पुरानी दुश्मनी निकालनी हो, जमीन हड़पनी हो, फलते-फूलते व्यापार को बर्बाद करना हो, तो अहमदिया और हिंदू सबसे आसान शिकार होते हैं। झूठी शिकायत करने वालों को पुलिस का पूरा साथ मिलता है। पाकिस्तानी समाज में यह नफरत किस कदर फैल चुकी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब जनरल क़मर जावेद बाजवा सेना प्रमुख बने थे तो उनके प्रतिद्वंद्वियों ने यह अफवाह फैला दी थी कि वे अहमदिया समुदाय से आते हैं। इससे वहां भारी हंगामा खड़ा हो गया था। लोग उन्हें सेना प्रमुख के पद पर नहीं देखना चाहते थे। बाद में बाजवा ने धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि वे अहमदिया नहीं हैं, तब जाकर मामला शांत हुआ। जब इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आर्थिक सुधारों और नीति‑निर्माण के लिए एक आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन किया था। उसमें उन्होंने एक मशहूर अर्थशास्त्री आतिफ को भी शामिल किया था, लेकिन उनकी नियुक्ति से कट्टरपंथी भड़क उठे थे। प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के इन प्रोफेसर को सिर्फ इस वजह से हटना पड़ा, क्योंकि वे अहमदिया समुदाय से हैं। उन्होंने कहा कि यह कदम सरकार की स्थिरता के लिए है। इसके बाद कुछ अन्य प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया था। इस पर कई पाकिस्तानियों ने खुशी मनाई थी। उन्हें यह मंजूर है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अमेरिका से लेकर चीन तक हाथ फैलाएं, लेकिन वे किसी अहमदिया को सलाहकार के रूप में बर्दाश्त नहीं कर सकते, चाहे वह कितना ही बड़ा विशेषज्ञ हो। पाकिस्तान जिस मंच पर भारत के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करे, यह मुद्दा उठाकर उसे बेनकाब करना चाहिए। पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के पास कोई जवाब नहीं होगा।

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