कैसी हो भारत की शिक्षा व्यवस्था?

जो स्कूल में पढ़ा, वह जीवन में कितना काम आ रहा है?

कैसी हो भारत की शिक्षा व्यवस्था?

देश की शिक्षा व्यवस्था ने बेरोजगारों की भीड़ पैदा की

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की शिक्षा व्यवस्था को अर्थव्यवस्था की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने की प्रक्रिया को तेज करने का आह्वान कर करोड़ों विद्यार्थियों के जीवन को सही दिशा देने की कोशिश की है। अगर यह काम पांच दशक पहले हो जाता तो आज देश में इतनी बेरोजगारी नहीं होती। अब लोग इस मुद्दे पर खुलकर बात करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर कई लोग पूछ चुके हैं- 'हमने स्कूल में रट-रटकर जो पाठ याद किए, मुर्गा बने, डंडे खाए, परीक्षाओं में रातभर जागकर पढ़ाई की, उसका कितना हिस्सा अब जीवन में काम आ रहा है?' क्या उस पढ़ाई को थोड़ा बेहतर बनाते हुए कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता था, जिससे वह जीवन में काम आती और लोगों को आत्मनिर्भर भी बनाती? आज का विद्यार्थी उस समय ठगा हुआ महसूस करता है, जब उसे पता चलता है कि स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाएं पास करने के लिए कोचिंग करनी होगी। कई प्रतियोगी परीक्षाओं का पाठ्यक्रम ऐसा है, जिसका बहुत बड़ा हिस्सा उस नौकरी के लिए चुने गए अभ्यर्थियों के जीवन में कोई काम नहीं आता। देश में जैसी शिक्षा व्यवस्था चली आ रही है, उसने युवाओं को कोई कौशल नहीं सिखाया, बल्कि बेरोजगारों की भीड़ पैदा की। आज स्थिति यह है कि उच्च शिक्षा प्राप्त लाखों युवाओं को पता ही नहीं कि उनमें क्या खूबी है और वे जीवन में क्या करना चाहते हैं! कुछ युवा यह आरोप लगाते हैं कि पिछली सरकारों ने जानबूझकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था लागू की, जिससे विद्यार्थी दु:खी एवं त्रस्त रहे। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह बहस का विषय हो सकता है।

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भारत में शिक्षा कैसी होनी चाहिए? इसका जवाब देना बहुत मुश्किल नहीं है। भारत में ऐसी शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, जो विद्यार्थी को अच्छा इन्सान बनाए। उसे समझदार और जिम्मेदार नागरिक बनाए। उसे सभी देशवासियों के साथ मिलकर रहना सिखाए। वह उसकी जिज्ञासा का दमन न करे, बल्कि सोचना और सवाल करना सिखाए। साथ ही, उसकी रुचि को पहचानकर कम-से-कम कोई एक कौशल जरूर सिखाए, जिससे उसे भविष्य में रोजगार मिले। वर्तमान में लाखों युवा ऐसे हैं, जो बेरोजगारी के कारण परिवार, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से ताने सुन रहे हैं। उनकी पीड़ा कौन समझेगा? नेता तो चुनावी मौसम में सरकारी नौकरियां देने की घोषणा कर देते हैं। सरकारी नौकरियां हैं ही कितनी? जिन्हें मिलती भी हैं, उन्हें कितना संघर्ष करना पड़ता है? क्या इस तरह बेरोजगारी दूर कर पाएंगे? बेरोजगारी का एक ही समाधान है- युवाओं को कौशल सिखाएं। उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं। इसकी शुरुआत स्कूल से ही हो। पाठ्यक्रम से उस सामग्री को कम करें या हटाएं, जिसकी जीवन में कम उपयोगिता है या कोई उपयोगिता नहीं है। उसके बारे में सामान्य जानकारी देना काफी रहेगा। रटने और ज्यादा नंबर लाने पर नहीं, बल्कि संभावनाओं और समाधान पर जोर दें। स्कूली पाठ्यक्रम की भाषा शैली में बहुत सुधार की जरूरत है। कुछ सुधार हुआ भी है, लेकिन काफी गुंजाइश है। उसमें रोचकता का समावेश होना चाहिए। किताब ऐसी न हो, जिसकी चार पंक्तियां पढ़ते ही कोई विद्यार्थी सोचे- 'यह तो मेरे लिए नहीं लिखी गई है!' हर क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए वहां रोजगार की संभावनाएं ढूंढ़ने पर खास जोर दिया जाए। राजस्थान में ऐसे लाखों व्यक्ति हैं, जिन्होंने स्कूल में भूगोल की किताब में समुद्र की गर्म एवं ठंडी जलधाराओं के बारे में पढ़ा होगा, लेकिन उन्हें अपने गांव के मौसम के बारे में कुछ नहीं बताया गया। वे अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी आदि के उद्योगों के बारे में जानते हैं। उन्हें अपने गांव में उद्योगों से जुड़ीं संभावनाओं के बारे में कुछ नहीं पढ़ाया गया। शिक्षा व्यवस्था में सुधार समय की मांग है। इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए तुरंत लागू करना चाहिए।

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