ऐसे दूर करें चूल्हे की चिंता
आवश्यकता आविष्कार की जननी है
जब भी समस्याएं आईं, भारत ने उनका समाधान ढूंढ़ा
वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी से चाय की दुकानों, होटलों और रेस्टोरेंटों पर अतिरिक्त आर्थिक भार आ गया है। यह आखिरकार ग्राहकों को ही उठाना पड़ेगा। इससे बाहर खाना-पीना महंगा हो जाएगा। पश्चिम एशिया में हिंसा का असर हमारी जेब पर पड़ रहा है। केंद्र सरकार की तीखी आलोचना हो रही है, जो होनी ही थी। इस समय सरकार किसी भी पार्टी या गठबंधन की होती, वह कीमत में बढ़ोतरी के फैसले को ज्यादा दिनों तक नहीं टाल सकती थी। यह हमारे लिए थोड़ा मुश्किल समय है, जिसका हमें मिलकर मुकाबला करना होगा। हमें इस विश्वास के साथ आगे बढ़ना होगा कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। पूर्व में, जब भी समस्याएं आईं, भारत ने उनका समाधान ढूंढ़ा। उससे हमारा देश और मजबूत हुआ। ऐसे समय में ही हमारी शक्तियों और क्षमताओं का पता चलता है। पश्चिम एशिया में संकट कब टलेगा और कब भड़केगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। हमें आत्मनिर्भरता का रास्ता ढूंढ़ना होगा। हमें इतना समर्थ बनना होगा कि दुनिया में कहीं भी लड़ाई हो, हमारे घरों और प्रतिष्ठानों के चूल्हे जलते रहें। पहले, इसके लिए एक साल की ठोस योजना बनानी होगी। जिन घरों और प्रतिष्ठानों तक पीएनजी कनेक्शन पहुंचाना संभव हो, वहां काम शुरू किया जाए, उसे बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया जाए। इससे एलपीजी सिलेंडर आपूर्ति प्रणाली पर दबाव कम होगा। गांवों में ईंधन के कई विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। वहां ऐसे चूल्हों की जरूरत है, जो धुआं कम से कम पैदा करें और आंच ज्यादा से ज्यादा दें। मिट्टी के परंपरागत चूल्हों की वापसी नहीं होनी चाहिए। उनके साथ लोगों का भावनात्मक जुड़ाव हो सकता है, लेकिन उन पर खाना बनाने में बहुत दिक्कत होती है।
हमारे वैज्ञानिकों को ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए ऐसा ईंधन और ऐसा चूल्हा विकसित करना चाहिए, जो पर्यावरण और घर के बजट, दोनों के लिए अनुकूल हों। ऐसे कुछ विकल्प सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। उन पर विदेशों में बहुत काम हो रहा है। धातु से बने चूल्हों में छोटा पंखा लगाकर बेहतरीन इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का काम आसान हो सकता है। वे एलपीजी सिलेंडरों पर कम निर्भर होंगे। अगर ग्रामीण क्षेत्र में एक सामान्य परिवार सालभर में 10 सिलेंडरों का इस्तेमाल करता है और वह पर्यावरण के लिए अनुकूल दूसरे ईंधन एवं चूल्हे का इस्तेमाल करने लग जाए तो उसके द्वारा एलपीजी खपत आधी या चौथाई हो सकती है। इस गैस की आपूर्ति शहरों में की जा सकती है। वहां भी ऐसे विकल्प ढूंढ़ने होंगे, जो एलपीजी पर निर्भरता में कमी लाएं। शहरों में इंडक्शन चूल्हे के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाए। इसके साथ ही विद्युत आपूर्ति तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि वह इंडक्शन चूल्हों की विद्युत खपत को बर्दाश्त कर सके। सरकार को एक विशेष योजना के तहत विद्युत उत्पादन बढ़ाना चाहिए। सुबह और शाम, जब खाना बनाया जाता है, तब विद्युत यूनिट के शुल्क में छूट दी जाए। जब लोगों को पता चलेगा कि इंडक्शन चूल्हा काफी सस्ता पड़ता है तो वे घरेलू एलपीजी सिलेंडरों का कम इस्तेमाल करेंगे। अगर उक्त योजना के अनुसार, शहरों के हर घर में इंडक्शन चूल्हा इस्तेमाल होने लगे तो भारत सालाना करोड़ों एलपीजी सिलेंडरों की बचत कर सकता है। ये सिलेंडर दुकानों, होटलों और रेस्टोरेंटों में काम लिए जा सकते हैं। भारत पर सूर्यदेव की अपार कृपा है। दुर्भाग्य से, हमने इस वरदान को पहचानने में बहुत देर कर दी। आज हर घर को सौर ऊर्जा से जोड़ने की जरूरत है। साथ ही, सोलर कुकर बहुत क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। हमारे पास इतने संसाधन मौजूद हैं, जिनका सही इस्तेमाल करें तो रसोईघर के ईंधन के लिए विदेशों की ओर देखना ही न पड़े।

