प्रजनन दर और देश का भविष्य

उत्तराखंड के कई गांव ऐसे हैं, जहां गिनती के लोग बचे हैं

प्रजनन दर और देश का भविष्य

पलायन एक बड़ी समस्या है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में देश की आबादी के बारे में जो टिप्पणी की, उससे सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। अगर प्रजनन दर 2.1 हो तो उसे आदर्श माना जा सकता है। समस्या तब पैदा होती है, जब यह इससे बहुत नीचे चली जाए। आज जापान, द. कोरिया, चीन, इटली, ग्रीस जैसे कई देशों में प्रजनन दर बहुत कम हो गई है। इसके प्रभाव नजर आने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ दशक बाद यहां की आबादी में नौजवानों की हिस्सेदारी बहुत कम रह जाएगी, हर जगह बुजुर्ग ही नजर आएंगे। तब सवाल उठेंगे- कारखानों में काम कौन करेगा, खेती-बाड़ी में पसीना कौन बहाएगा, सरहद की रखवाली कौन करेगा और युद्ध की स्थिति में दुश्मन से कौन लड़ेगा? भारत में एक तरफ तो बहुत ज्यादा आबादी के कारण होने वाली समस्याओं की चर्चा की जाती है, दूसरी तरफ कुछ राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में कम प्रजनन दर का मुद्दा उठाया जाता है! इनमें से कौनसी बात सही है? वास्तव में दोनों ही बातें अपनी जगह सही हैं। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि भारत की कुल आबादी 140 करोड़ के आंकड़े को पार कर चुकी है, वहीं कुछ राज्यों में प्रजनन दर 2.1 से भी काफी कम हो चुकी है। यह तस्वीर असंतुलन की स्थिति को दर्शाती है, जिससे दो-तीन दशकों में कई समस्याएं पैदा होने की आशंका है। इसके साथ पलायन एक बड़ी समस्या है। आज उत्तराखंड के कई गांव ऐसे हैं, जहां गिनती के लोग बचे हैं। उनमें भी ज्यादातर बुजुर्ग हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति राजस्थान के कई गांवों में पैदा हो सकती है, जहां नौजवान तो पढ़ाई और नौकरी के लिए शहरों का रुख कर रहे हैं, जबकि खेत-खलिहान सूने पड़े हैं।

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प्रजनन दर में भारी गिरावट की एक बड़ी वजह शहरीकरण है। जापान के नागोरो नामक गांव की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं। इसे बुजुर्गों का गांव कहा जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यहां प्रजनन दर में बहुत भारी गिरावट आ गई है। चूंकि नौजवानों को अपना भविष्य टोक्यो जैसे बड़े शहरों में दिखता है, लिहाजा वे एक-एक कर गांव छोड़कर चले गए। पीछे सिर्फ बुजुर्ग रह गए। निस्संदेह जापान के शहरों में रोजगार के बहुत अवसर हैं, लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं। वहां काम के भारी दबाव के कारण जापानी युवा शादी और परिवार बढ़ाने से मुंह मोड़ने लगे हैं। चीन, रूस, जापान, द. कोरिया जैसे कई देशों में सरकारें कोशिश कर रही हैं कि युवा शादी करें और भावी पीढ़ी को इस दुनिया में लाएं। इसके लिए स्थानीय प्रशासन वित्तीय सहायता समेत कई सुविधाएं दे रहा है। इसके बावजूद वहां प्रजनन दर में खास बढ़ोतरी देखने को नहीं मिल रही है। इसी साल अक्टूबर में एक रिपोर्ट ने सबका ध्यान आकर्षित किया था, जिसमें बताया गया था कि चीन में प्रजनन दर में भारी गिरावट के कारण सैकड़ों स्कूलों पर ताले लग गए हैं। पढ़ने के लिए बच्चे ही नहीं होंगे तो स्कूलों में कौन जाएगा? अगर भारत में प्रजनन दर से संबंधित आंकड़े पर गौर करें तो पता चलता है कि आजादी से लेकर अब तक इसमें उल्लेखनीय गिरावट आई है। कई राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में यह 2.1 से कम हो गया है। हालांकि बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में यह कुछ ज्यादा है। हमें अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि प्रजनन दर 2.1 से काफी नीचे जाने पर (पैदा होने वाली) समस्याओं की दस्तक उस समय सुनाई नहीं देती। लगभग दो दशक बाद उनका असर दिखाई देने लगता है। उसके बाद वे धीरे-धीरे बढ़ने लगती हैं। हालांकि इन समस्याओं को टाला जा सकता है। इसके लिए सरकारों को ये उपाय करने होंगे- सरकारी स्कूलों की हालत सुधारें, सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर बनाएं, पलायन को रोकें, गांवों में रोजगार के अवसरों का सृजन करें, 'सिर्फ सरकारी नौकरी करूंगा/गी' - की धारणा को बदलें, स्वरोजगार को बढ़ावा दें, बेहद खर्चीली शादियों का महिमा-मंडन बंद करें, समाज में सद्भाव पर जोर दें। 'सादगी में भी संपन्नता' - के आदर्श का प्रसार करें।

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