नशे की प्रवृत्ति पर लगाम जरूरी

'नशे' को 'नाश' की जड़ यूं ही नहीं कहा गया है

नशे की प्रवृत्ति पर लगाम जरूरी

यह तन, मन, धन और जीवन ... सबकी हानि करता है

तंबाकू के सेवन और उससे होने वाले दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक सरकार द्वारा सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (सीओटीपीए) में संशोधन स्वागत-योग्य फैसला है। इसके तहत राज्यभर में हुक्काबारों पर पाबंदी जनस्वास्थ्य के लिए सराहनीय है। वहीं, 21 साल से कम उम्र के लोगों को सिगरेट तथा अन्य तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर पाबंदी से युवाओं में नशे की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी। 'नशे' को 'नाश' की जड़ यूं ही नहीं कहा गया है। यह तन, मन, धन और जीवन ... सबकी हानि करता है। इस बात पर ज्यादातर लोग सहमत होंगे कि खैनी, जर्दा, बीड़ी, सिगरेट, शराब या किसी भी नशीले पदार्थ की लत लगने की शुरुआत किशोरावस्था या युवावस्था से होती है। दोस्तों के 'उकसावे' में आकर एक बार जिस नशीले पदार्थ का सेवन शुरू कर दिया जाता है, बाद में उससे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल होता है। पिछले कुछ वर्षों में बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक में 'हुक्काबार' तेजी से पनपे हैं। हुक्के को न जाने क्यों 'प्रतिष्ठा' और 'परंपरा' से जोड़कर देखा जाता है, जबकि इसमें न तो प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली कोई विशेषता है और न ही इससे कोई स्वस्थ परंपरा जुड़ी हुई है! इसे ऊंचे दर्जे की चीज समझना खुद को धोखे में डालने जैसा है। यह भी देखने में आया है कि हुक्काबार में मौज-मस्ती के नाम पर लोगों को अत्यंत मादक और हानिकारक पदार्थ परोसे जाते हैं। उनका धुआं फेफड़ों में लेने के बाद संबंधित व्यक्ति एक विचित्र किस्म की अनुभूति पाता है। इसे वह कुछ क्षणों का 'आनंद' समझता है, लेकिन असल में उस पदार्थ से उसके विवेक और चेतना का नाश होता है।

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के एक गांव में युवाओं के बीच गांजा और भांग के नशे की लत बढ़ती जा रही है। उधर खैनी, जर्दा, बीड़ी, सिगरेट, शराब जैसे पदार्थों के नशे अपनी जगह हैं ही, गांजा-भांग पर भी खूब जोर है। वहां एक परिवार का इकलौता लड़का, जो कपड़ों के व्यवसाय से अच्छी कमाई कर रहा था, को कुसंगति के कारण इन पदार्थों की लत लग गई। एक दिन किसी सामाजिक कार्यक्रम में उसने सिगरेट में गांजा भरकर इतने कश लगाए कि कुछ समय बाद बेसुध हो गया। जमीन पर गिरने से उसके सिर में भी चोट आई। बाद में पता चला कि उसे लकवा हो गया है। उसके इलाज में परिवार की पूरी जमा-पूंजी खर्च हो गई, कीमती सामान बिक गया। उसके पिता यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके और उनकी मृत्यु हो गई। सब रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया। नशे की लत ने उस खुशहाल परिवार को तबाह कर दिया। अब वह युवक लकड़ी के सहारे से बमुश्किल चल पाता है। वह उस लम्हे को कोसता है, जब उसे 'दोस्तों' ने पहली बार सिगरेट पीने के लिए उकसाया था। अब वह मीठी सुपारी तक नहीं खाता और दूसरों को भी हर किस्म के नशे से दूर रहने की सलाह देता है। सरकारें समय-समय पर तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री से संबंधित नियमों को सख्त करती रहती हैं, कुछ पाबंदियां लगा देती हैं, लेकिन जिन्हें नशा करना होता है, वे उनका 'तोड़' ढूंढ़ लेते हैं। वे ऐसा करके किसका नुकसान करते हैं? निस्संदेह खुद का ही नुकसान करते हैं। भारत के एक राज्य में शराब की बिक्री पर पाबंदी लगी हुई है, जबकि उसके पड़ोसी राज्य में बिक्री की छूट है। उस राज्य के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले कई लोग, जो इसका सेवन करते हैं, सीमा पार कर इस ओर चले आते हैं। जब नशा कर लेते हैं तो वापस चले जाते हैं। अब इस स्थिति में सरकार को क्या करना चाहिए? क्या वह एक-एक व्यक्ति की जांच शुरू कर दे? सरकार नियम बना सकती है, कुछ सख्ती बरत सकती है, नशीले पदार्थों के सेवन को हतोत्साहित कर सकती है, लेकिन आखिरकार जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर ही आती है। उसे इन पदार्थों से दूर रहने के लिए इच्छाशक्ति दिखानी होगी। अगर नशा नहीं करते हैं तो यह प्रशंसनीय है। अगर किसी कारणवश इसकी लत लग गई है तो अभी संकल्प लेकर इसे छोड़ना ही कल्याणकारी है।

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