कर्नाटक उपचुनाव टालने के लिए अयोग्य विधायकों की नई अर्जी पर न्यायालय 13 को करेगा सुनवाई

कर्नाटक उपचुनाव टालने के लिए अयोग्य विधायकों की नई अर्जी पर न्यायालय 13 को करेगा सुनवाई

उच्चतम न्यायालय

नई दिल्ली/भाषा। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि वह कर्नाटक में 15 सीटों पर पांच दिसंबर को होने वाले उपचुनाव स्थगित करने का, निर्वायन आयोग को निर्देश देने के राज्य के अयोग्य विधायकों के आवेदन पर 13 नवंबर को सुनवाई करेगा। न्यायमूर्ति एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ पहले ही कांग्रेस-जद(एस) के 17 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर 25 अक्टूबर को सुनवाई पूरी कर चुकी है और इसमें उसके फैसले का इंतजार है। अयोग्य विधायकों का कहना है कि चूंकि उनकी याचिकाओं पर न्यायालय के फैसले का इंतजार है, इसलिए आयोग को इस मामले में शीर्ष अदालत का फैसला आने तक उपचुनाव टालने का निर्देश दिया जाना चाहिए। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा इस आवेदन पर शीघ्र सुनवाई के लिये मौखिक उल्लेख किये जाने पर रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि आवेदन को, इसकी खामियों को दूर किये जाने पर, 13 नवंबर, बुधवार को सूचीबद्ध किया जाये।
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता को निर्देश दिया कि इस आवेदन की प्रति प्रतिवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं को तत्काल दी जाये। अयोग्य घोषित विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इस मामले का उल्लेख किया था और कहा कि विधानसभा की सीटों के लिए पांच दिसंबर को उपचुनाव होने हैं और उम्मीदवारों को 11 से 18 नवंबर के दौरान नामांकन पत्र दाखिल करने हैं।
उन्होंने कहा कि अयोग्य घोषित किये गये विधायक इसमें नामांकन पत्र दाखिल नहीं कर सकेंगे और वैसे भी इस मामले में अभी तक शीर्ष अदालत ने फैसला नहीं दिया है। रोहतगी ने अयोग्यता को चुनौती देने वाले विधायकों की याचिकाओं पर शीर्ष अदालत का निर्णय आने तक उपचुनाव स्थगित करने का अनुरोध किया। इससे पहले, निर्वाचन आयोग ने अयोग्य घोषित विधायकों की याचिकायें शीर्ष अदालत में लंबित होने के तथ्य के मद्देनजर 21 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव पांच दिसंबर तक के लिये स्थगित कर दिये थे। कर्नाटक कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायालय से कहा था कि विधायकों की अयोग्यता को चुनौती देने वाला यह मामला संविधान पीठ को सौंपा जाना चाहिए।
उनका कहना था कि तत्कालीन अध्यक्ष के आर रमेश कुमार ने विधायकों को अयोग्य घोषित करने में अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया था और उनके फैसले पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। अयोग्य घोषित किये गये कुछ विधायकों ने शीर्ष अदालत में दलील दी थी कि सदन की सदस्यता से इस्तीफा देना उनके अधिकार में शामिल है और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इसके बाद उन्हें अयोग्य घोषित किए जाने की कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण है।

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