'आत्मनिर्भर रसोईघर' आज की ज़रूरत
विदेशों की आपूर्ति प्रणाली पर निर्भरता में जोखिम है
हमें कुछ विकल्प ढूंढ़ने होंगे
ईरान के साथ इज़राइल-अमेरिका के युद्ध से भारतीय घरों और उद्योगों पर असर पड़ा है। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो लगातार आ रहे हैं, जिनमें आम लोग गैस सिलेंडरों के लिए लंबी कतारों में खड़े हैं। प्रशासन कह रहा है कि सिलेंडरों की कोई कमी नहीं है, आपूर्ति बराबर हो रही है। जनता कह रही है कि सिलेंडरों की आपूर्ति धीमी गति से हो रही है। एक वजह यह है कि लोग घबराहट में ज़्यादा बुकिंग कर रहे हैं, जिससे आपूर्ति प्रणाली पर अचानक दबाव आ गया है। इस घटना ने हमें यह सबक दे दिया है कि रसोईघर में ईंधन संबंधी ज़रूरतों के लिए विदेशों पर निर्भरता खतरनाक हो सकती है। युद्ध हजारों किलोमीटर दूर हो रहा है, लेकिन उसका असर हम पर भी पड़ रहा है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। वाणिज्यिक उपयोग वाले सिलेंडर न मिलने से कई ढाबों और चाय की दुकानों का संचालन मुश्किल हो गया है। यह स्थिति तब है, जब हमारा देश हर साल अरबों डॉलर गैस खरीदने पर खर्च कर रहा है। पिछले एक दशक में भारत सरकार ने महानगरों से लेकर गांव-ढाणियों तक रसोई गैस पहुंचा दी। पहले, गांवों में लकड़ी के चूल्हों पर खाना पकाया जाता था। कई लोगों ने अपने बचपन में उसी चूल्हे की रोटियां खाई होंगी। तब गैस सिलेंडरों से कोई लेना-देना नहीं था। बड़े शहरों में सिलेंडरों की ज़रूरत होती थी, लेकिन ईंधन के मामले में गांव पूरी तरह आत्मनिर्भर थे। अब सबको गैस सिलेंडरों की आदत हो गई है। लकड़ी के चूल्हे वाले दौर में लौटना संभव नहीं है। उससे धुआं बहुत निकलता है, जो वायु प्रदूषण का कारण बनता है। हमें इसके अन्य विकल्प ढूंढ़ने होंगे।
अगर रसोईघर का ईंधन विदेशों की आपूर्ति प्रणाली पर निर्भर रहेगा तो हमारे लिए जोखिम बना रहेगा। हो सकता है कि कुछ दिन बाद ईरान और इज़राइल-अमेरिका कोई शांति समझौता कर लें। वह कब तक चलेगा? इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। अगर साल-दो साल बाद दोबारा ऐसी भिड़ंत शुरू हो गई तो क्या होगा? इसलिए हमें अन्य विकल्पों की ओर कदम बढ़ाना होगा। शहरों में इंडक्शन स्टोव एक अच्छा विकल्प हो सकता है। अगर कोई परिवार सौर ऊर्जा का उपयोग कर रहा है तो इससे रसोईघर का बजट संतुलित रहेगा। वहीं, गांवों में लकड़ी के परंपरागत चूल्हे के बजाय एक खास तरह के चूल्हे के बारे में विचार करना चाहिए। यह सोशल मीडिया पर रॉकेट स्टोव के नाम से मशहूर है, जो लोहे से बना होता है। इसका आकार अंग्रेजी के 'एल' अक्षर जैसा होता है, जिसके बीच में एक मोटी नली लगी होती है। विदेशों में कई जगह इसका उपयोग हो रहा है। यह बहुत कम धुआं छोड़ता है। भारत में लोहे के कारीगर इसे आसानी से बना सकते हैं। वे इसमें कुछ सुधार भी कर सकते हैं। इसमें कहीं छोटा पंखा जोड़कर उसे हाथ से या बिजली से चलाने की व्यवस्था करने पर विचार किया जा सकता है। अगर गांवों और कस्बों में रॉकेट स्टोव सुलभ हों तो घरों में गैस सिलेंडर न होने पर भी लोगों को परेशानी नहीं होगी। वे घबराहट में बुकिंग नहीं करेंगे। इसी तरह, सोलर ओवन एक क्रांतिकारी विकल्प बन सकता है। एक साधारण-सा बॉक्स, जिसमें दो दर्पण लगे होते हैं, में कई चीजें बन सकती हैं। यह दूध व पानी गर्म करने से लेकर चाय, चावल, दाल, सब्जी, खीर, खिचड़ी, दलिया समेत कई चीजें बनाने में मददगार साबित हो सकता है। इसे धूप की ज़रूरत होती है, जो हमारे देश में लगभग आठ महीने तो अच्छी-खासी पड़ती ही है। सोलर ओवन रसोई गैस को पूरी तरह नहीं हटा सकता, लेकिन उसकी बहुत बचत कर सकता है। लोग बताते हैं कि पहले उनके यहां गैस सिलेंडर 30 से 45 दिन चलता था। सोलर ओवन का उपयोग करने के बाद यह 50 से 70 दिन चल जाता है। इससे ईंधन की बहुत बचत हो रही है। अगर घर-घर में सोलर ओवन हों तो रसोई गैस पर खर्च हो रहे विदेशी मुद्रा भंडार की काफी बचत हो सकती है।

