सद्भाव से मिटेगा भेदभाव

सबको अपनी उन्नति के लिए समान अवसर मिलें

सद्भाव से मिटेगा भेदभाव

सभी जातियों में सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए रास्ते खोजें

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए जो सुझाव दिया है, उस पर अमल करने से समाज में क्रांतिकारी बदलाव आ सकते हैं। जाति एक ऐसी व्यवस्था है, जिसे हटाने और मिटाने के लिए कई लोगों ने संघर्ष किए, लेकिन इसे पूर्णत: समाप्त नहीं कर पाए। हां, समाज में सकारात्मक बदलाव जरूर आए हैं। पहले, जिस स्तर पर भेदभाव होता था, उसमें बहुत कमी आ गई है। इसका स्वागत होना चाहिए। किसी भी इन्सान को जाति, लिंग, रंग, भाषा, प्रांत आदि के नाम पर भेदभाव का सामना बिल्कुल न करना पड़े। सबको अपनी उन्नति के लिए समान अवसर मिलें। जहां तक जातिगत भेदभाव को खत्म करने की बात है, क्या इसके लिए जाति को खत्म कर देना ही एकमात्र विकल्प है? अगर हम सभी जातियों में सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए रास्ते खोज लें तो भेदभाव को बहुत जल्दी खत्म कर सकते हैं। हमारे पूर्वजों ने ऐसी कोशिशें की थीं, जिनके बहुत अच्छे नतीजे निकले थे। पहले, ग्रामीण क्षेत्रों में जो भी नई बहू आती थी, उसी गांव का एक परिवार, जिसकी जाति अलग होती थी, उसे अपनी बेटी मानकर गोद लेता था। उसे उतना ही प्रेम और सम्मान मिलता था, जितना घर की अन्य बेटियों को मिलता था। लोग उन रिश्तों को आखिरी सांस तक निभाते थे। क्या हम पूरे देश में ऐसी व्यवस्थाओं का निर्माण नहीं कर सकते? जातिगत भेदभाव को कानूनी उपायों से एक हद तक दूर किया जा सकता है, लेकिन इसका उन्मूलन सामाजिक स्तर पर सद्भाव से ही हो सकता है।

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समाज में एकता की भावना पैदा करने के लिए सभी जातियों को साथ लेना होगा। अगर हम कुछ जातियों को दिन-रात इस बात के लिए कोसते रहेंगे कि उनके पूर्वजों में से किसी ने गलत काम किया था तो इससे सद्भाव की स्थापना नहीं होगी। इतिहास के किसी कालखंड में कोई सामाजिक विकृति आई थी तो उसके लिए वर्तमान पीढ़ी को दोष देना उचित नहीं है। हर व्यक्ति गरिमापूर्ण जीवन जीने का हकदार है। सबको साथ लेकर चलेंगे तो समाज मजबूत होगा। स्थानीय स्तर पर ऐसे प्रयोगों को बढ़ावा देना चाहिए, जो भेदभाव के बंधनों को दूर करें। उदाहरण के लिए, विभिन्न जातियों के लोग पखवाड़े या महीने में एक बार हर घर से अनाज, दाल और सब्जियां आदि लेकर  सबके लिए भोज का आयोजन करें। रसोई के काम में सभी जातियों के लोग हाथ बंटाएं। खाना परोसते समय सभी जातियों के लोग सहयोग करें। इससे जातिगत भेदभाव को दूर करने में मदद मिलेगी। आज सोशल मीडिया पर भेदभाव को दूर करने के बजाय ऐसी सामग्री की भरमार है, जो विद्वेष को बढ़ावा देती है। कोई व्यक्ति एक जाति के खिलाफ गलत टिप्पणी कर देता है, जिसके बाद अन्य लोग झगड़ते रहते हैं। अगर गौर करेंगे तो पाएंगे कि ऐसे कई अकाउंट विदेशों से संचालित होते हैं। उनका काम है- भारतवासियों में जाति के नाम पर लड़ाई-झगड़े करवाना। लोगों में फूट डालना कितना आसान है! यह दुर्भाग्य का विषय है। एक तरफ लोग याद करते हैं कि अंग्रेजों ने फूट डालकर देश को गुलाम बनाया था, लेकिन दूसरी तरफ जब कोई व्यक्ति उकसावे वाली टिप्पणी करता है तो सामाजिक एकता की सारी बातें भूल जाते हैं। हमें विचार करना चाहिए- कहीं हम वही गलती तो नहीं कर रहे, जो अतीत में हुई थी? इक्कीसवीं सदी में किसी भी तरह के भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

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