नए संकल्पों के साथ आगे बढ़े भारत
'मन की बात' कार्यक्रम में बोले प्रधानमंत्री
स्वस्थ, शिक्षित और विकसित भारत बनाने का संदेश दिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' कार्यक्रम की 129वीं कड़ी में स्वस्थ, शिक्षित और विकसित भारत बनाने का संदेश दिया है। निस्संदेह देश नए साल में नई उम्मीदों और नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ने को तैयार है। इसके लिए समस्त देशवासियों का सहयोग जरूरी है। प्रधानमंत्री ने नियमित व्यायाम करने के लिए जो आह्वान किया है, युवाओं को उस पर जरूर ध्यान देना चाहिए। आज पढ़ाई और कामकाज संबंधी व्यस्तता के कारण बहुत कम युवा व्यायाम आदि कर पाते हैं। अगर व्यायाम को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लें तो कई बीमारियों से सुरक्षित रह सकते हैं। जो लोग नियमित व्यायाम करते हैं, उनके लिए अपने कार्य क्षेत्र में बढ़िया प्रदर्शन करने की संभावनाएं बेहतर होती हैं। प्रधानमंत्री ने 'कन्नड़ा पाठशाले' का उल्लेख कर मातृभाषाओं के सम्मान को विशेष महत्त्व दिया है। दुबई में रहने वाले कन्नड़ा परिवारों की यह पहल अत्यंत सराहनीय है। उनके बच्चे अंग्रेजी और तकनीक का ज्ञान तो प्राप्त कर ही रहे हैं, अपनी मातृभाषा भी सीख रहे हैं। अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिए मातृभाषा का ज्ञान होना चाहिए। आज कई परिवार ऐसे हैं, जिनके बच्चे मातृभाषा में सामान्य बातचीत भी नहीं कर पाते। उनकी यह कहकर बड़ाई की जाती है कि 'इनके सामने बड़े-बड़े अंग्रेज फेल हैं!' अंग्रेजी का अपनी जगह महत्त्व है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता, लेकिन इसे हमारी मातृभाषाओं का स्थान नहीं देना चाहिए। जो जुड़ाव मातृभाषा के जरिए पैदा होता है, वह किसी और भाषा से पैदा नहीं हो सकता। सीखने, समझने, सोचने के लिए मातृभाषा सर्वोत्तम होती है।
प्रधानमंत्री ने मोइरांगथेम सेठ, जो मणिपुर के दूर-दराज के इलाकों में सौर ऊर्जा का प्रचार कर रहे हैं, की कहानी बताकर करोड़ों नागरिकों को प्रेरित किया है। मोइरांगथेम के प्रयासों से उन घरों में रोशनी पहुंच रही है, जहां पहले अंधेरा था। मणिपुर में साल के ज्यादातर दिनों में अच्छी धूप रहती है। प्रकृति इस पर मेहरबान है। भारत के अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास भी यह वरदान है। हमें इसका भरपूर फायदा लेना चाहिए। सौर ऊर्जा उन्नति के नए द्वार खोल रही है। इससे मणिपुर में कई परिवारों की कमाई में बढ़ोतरी हुई है। अब वे अपने काम को ज्यादा समय दे सकते हैं। प्रधानमंत्री ने आईसीएमआर की एक रिपोर्ट के बारे में बताकर महत्त्वपूर्ण मुद्दे की ओर देशवासियों का ध्यान आकर्षित किया है। कई लोग बिना सोचे-समझे एंटीबायोटिक दवाइयों का सेवन करते हैं, जिससे उन्हें सेहत संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसका नतीजा यह है कि निमोनिया समेत कई बीमारियों के खिलाफ एंटीबायोटिक दवाइयां कमजोर पड़ रही हैं। कुछ विकसित देशों में तो एंटीबायोटिक दवाइयां देना बहुत कम हो गया है। भारतीय मूल की एक महिला जो नीदरलैंड में रहती है, की तबीयत खराब हुई तो डॉक्टरों ने जांच रिपोर्टें देखने के बाद बहुत कम दवाइयां दीं। उनमें ज्यादातर विटामिन की गोलियां थीं। महिला को कुछ फलों का रस आदि पीने की सलाह दी गई। 'इतनी कम दवाइयों से सेहत कैसे ठीक होगी?' महिला यह सोचकर चिंतित थी, लेकिन वह एक पखवाड़े में बिल्कुल ठीक हो गई। अपनी मर्जी से दवाइयां लेने की आदत घातक सिद्ध हो सकती है। कुछ महीने पहले एक मामला सोशल मीडिया पर बहुत चर्चा में रहा था। एक व्यक्ति ने डॉक्टर से परामर्श लिए बिना (अपने मित्र की सलाह पर) कोई दवाई ले ली थी। इसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। दवाई की वजह से लिवर समेत कई अंगों को नुकसान पहुंचा था। उसके शरीर में खून के थक्के बनने लगे थे, जिन्हें हटाने के लिए महंगी दवाइयां लेनी पड़ीं। उसकी हालत देखकर 'मित्र' ने भी अपना मोबाइल फोन बंद कर लिया था। अगर वह व्यक्ति पहले ही किसी डॉक्टर को दिखाकर दवाई लेता तो ऐसी नौबत नहीं आती।

