मैं अगर कविता नहीं लिखती तो शायद हथियार उठा लेती: जसिन्ता केरकेट्टा
कवयित्री जसिन्ता केरकेट्टा के साथ दक्षिण भारत राष्ट्रमत दैनिक के समूह संपादक श्रीकांत पाराशर।
बेंगलूरु/दक्षिण भारत। “शब्द” साहित्यिक संस्था के वार्षिकोत्सव एवं सम्मान-अर्पण समारोह में एक लाख रुपये का “अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान” प्राप्त करने वाली झारखंड के आदिवासी समुदाय की कवयित्री जसिन्ता केरकेट्टा बहुत ही संवेदनशील रचनाकार हैं। अपनी साहित्यिक यात्रा की जानकारी देते हुए उनका गला रुंध गया, आँखें नम हो गईं, कुछ पल तक जिह्वा से शब्द नहीं निकले।
उन्होंने अपने उद्बोधन के बीच बीच में स्वरचित छोटी छोटी कविताएँ भी सुनाईं जिनमें नारी पीड़ा के साथ साथ आदिवासी समुदाय के साथ समाज व व्यवस्था द्वारा हुए अन्याय व दोहन का मार्मिक चित्रण था। उनकी कविताओं में प्रकृति के साथ मानव समाज द्वारा किए जा रहे खिलवाड़ के प्रति दर्द था।उन्होंने अपने माता-पिता के संघर्ष की कहानी भी सुनाई और स्वयं का किस प्रकार हिंदी भाषा की तरफ झुकाव पैदा हुआ, इसका भावपूर्ण विवरण दिया।उन्होंने झारखंड के आदिवासियों की पीड़ा और स्त्रियों का दुख क़रीब से देखा था और उसी पर लिखना शुरू किया। उन्होंने कहा कि वे बिना आँसू के कविता नहीं लिख पाती थीं। उनमें आदिवासी समुदाय के दमन के खिलाफ बहुत आक्रोश था। उन्होंने बताया कि अगर वे कविता नहीं लिखतीं तो शायद हथियार उठा लेतीं।
जसिन्ता ने लेखन के संबंध में कहा, कविता अगर बेहतर इंसान नहीं बनाती है तो केवल किताबों का ढेर लगाना व्यर्थ है। लेखन को नदी की तरह बहना चाहिए। उन्होंने स्वयं के बारे में कहा, लेखन के साथ जीवन कैसा जी रही हूँ, इसका अवलोकन करती हूँ। यदि मुझे लगता है कि मैं जो लिखती हूँ, उसे अपने जीवन में नहीं ढाल पा रही हूँ तो मैं लिखना रोक देती हूँ। उन्होंने कहा कि कविता अगर बेहतर इंसान नहीं बनाती है तो किताबों का ढेर लगाना व्यर्थ है।


