इस घातक प्रवृत्ति से बचें

इन दिनों बांग्लादेश में भारतविरोधी माहौल है

इस घातक प्रवृत्ति से बचें

बांग्लादेशियों को भारत से बाहर निकालें

केरल में पलक्कड़ जिले के वालयार के पास किझाकेट्टप्पल्लम में भीड़ द्वारा छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या किए जाने का मामला चिंताजनक है। किसी व्यक्ति पर अपराधी होने का संदेह है तो उसके बारे में पुलिस को सूचना देनी चाहिए। अगर भीड़ के हाथों मार-कुटाई से इन्साफ होने लगेगा तो अदालतों और कानून की क्या जरूरत है? उक्त व्यक्ति के बारे में कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। किसी को संदेह था कि वह चोरी में शामिल था, तो किसी ने उसे बांग्लादेशी समझ लिया था। चूंकि इन दिनों बांग्लादेश में भारतविरोधी माहौल है, इसलिए यहां लोगों में नाराजगी होना स्वाभाविक है। इसका यह मतलब नहीं कि भारत में लोग कानून को हाथ में लेकर हिंसा पर उतर आएं। फिर बांग्लादेशियों और हममें अंतर ही क्या रहेगा? भारत में बहुत लोग दीपूचंद्र दास की मॉब लिंचिंग से आहत हैं। इस संबंध में कई जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। बांग्लादेशियों को भारत से बाहर निकालने की मांग की जा रही है। हर राष्ट्रवादी नागरिक चाहेगा कि देश में वही विदेशी नागरिक रहे, जिसके पास सरकार की अनुमति हो। हमारे देश में घुसपैठियों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। जनता इसके लिए उचित मंचों से आवाज उठा सकती है। कौन बांग्लादेशी है और कौन नहीं है - यह तय करना उसका काम नहीं है। सबको इस सीमारेखा का ध्यान रखना चाहिए। याद करें, कुछ साल पहले भारत में भीड़ द्वारा पीटे या मार गिराए जाने की कई घटनाएं सुनने को मिली थीं। सोशल मीडिया पर खुराफाती तत्त्वों ने अफवाहों को हवा दी थी, जिसके बाद भीड़ ने 'अतिसक्रियता' दिखाते हुए निर्दोष लोगों की पिटाई कर दी थी। वह सिलसिला दोबारा शुरू नहीं होना चाहिए।

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साल 2018 में असम के कार्बी आंगलोंग में सोशल मीडिया पर अफवाह फैली थी कि बच्चों का अपहरण करने वाला एक गिरोह घूम रहा है। कुछ ग्रामीणों ने उस पर विश्वास करते हुए दो युवकों को इतना पीटा कि उनकी मौत हो गई। बाद में पता चला कि दोनों युवक पर्यटक थे। उसी साल महाराष्ट्र के धुले ज़िले में ऐसी ही अफवाह फैली, जिसका भयानक नतीजा निकला था। भीड़ ने पीट-पीटकर पांच लोगों की जान ले ली थी। घटना के बाद पता चला कि वे आम लोग थे। साल 2017 और 2018 में झारखंड में गाय चोरी, बच्चा चोरी से संबंधित कई पोस्ट वायरल हुई थीं, जिन पर विश्वास कर भीड़ ने अलग-अलग जिलों में निर्दोष लोगों को पीटा था। महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं और उनके वाहन चालक को भीड़ ने बच्चा चोरी के संदेह में पीट-पीटकर मार डाला था। वे तीनों ही किसी अपराध में शामिल नहीं थे। सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार से पहले, साल 2007 में राजस्थान के झुंझुनूं जिले में एक साधु की हत्या का मामला सुर्खियों में रहा था। साधु को प्यास लगी तो एक घर से पानी मांगा, लेकिन लोगों ने पीट-पीटकर उसकी हत्या कर दी थी। अब सोशल मीडिया के कारण ऐसी घटनाओं के वीडियो वायरल हो जाते हैं। इससे ज्यादा लोगों को पता चल जाता है। मॉब लिंचिंग की घटनाएं पहले भी होती थीं, लेकिन तब खबरों का दायरा सीमित था। सवाल है- सामान्य लोगों की भीड़ अचानक हिंसक व्यवहार क्यों करने लगती है? इसकी कोई एक वजह नहीं हो सकती। प्राय: जिन देशों में लोगों को कानून और व्यवस्था पर कम भरोसा होता है, जहां इन्साफ मिलना मुश्किल होता है, अफवाहें तेजी से फैलती हैं, असुरक्षा की भावना ज्यादा होती है, वहां भीड़ उकसावे में आकर हिंसक व्यवहार करती है। विकसित देशों में ऐसी घटनाएं नहीं होतीं। लोगों को इस घातक प्रवृत्ति से बचना चाहिए। इससे किसी निर्दोष व्यक्ति की जान जा सकती है। अगर कोई अपराधी भी भीड़ के हत्थे चढ़ जाए तो सही तरीका यही है कि उसे पुलिस के हवाले किया जाए। उसे सजा देना अदालत का काम है। यह जिम्मेदारी अदालत पर छोड़ दें तो सबके लिए बेहतर होगा।

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