जनादेश का सम्मान करें

जो उम्मीदवार जीतें, उन्हें विनम्र रहना चाहिए

जनादेश का सम्मान करें

सबके कल्याण के लिए काम करें

केरल, असम, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान के बाद अब मतगणना की बारी है। देश-दुनिया के करोड़ों लोगों की निगाहें इन नतीजों पर होंगी। इस समय राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को संयम से काम लेना चाहिए। जो उम्मीदवार जीतें, उन्हें विनम्र रहना चाहिए। जो राजनीतिक दल सत्ता पाएं, उन्हें अहंकार से दूर रहना चाहिए। वे इन नतीजों को जनता-जनार्दन का आशीर्वाद मानें और सबके कल्याण के लिए काम करें। जो उम्मीदवार हारें, उन्हें व्यवस्थाओं में खोट ढूंढ़ने के बजाय आत्मावलोकन करना चाहिए। उन्हें क्षेत्र में सक्रिय रहकर जनता के मुद्दे उठाने चाहिएं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जब कोई उम्मीदवार चुनाव में हारा, लेकिन उसकी निष्ठा पर विश्वास कर जनता ने अगली बार विजयी बना दिया। सुरक्षा बलों को उत्पाती और उपद्रवी तत्त्वों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजे आने के बाद हिंसा का इतिहास रहा है। हालांकि इस बार मतदान बहुत शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। चुनाव आयोग की सख्ती के आगे उपद्रवियों के तेवर ढीले पड़ गए। पश्चिम बंगाल में तृणकां लगातार कथित धांधली का मुद्दा उठा रही है। वह अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दे सकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो भवानीपुर के एक ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम में पहुंचकर मशीनों से छेड़छाड़ का आरोप लगा चुकी हैं। एग्जिट पोल्स में तृणकां की हालत खस्ता दिखाई गई है। क्या मतदान के बाद ईवीएम को लगातार निशाना बनाने की कोशिश दरअसल एक बहाना है? इस तरह तृणकां चुनाव जीतने पर यह तर्क दे सकती है कि ईवीएम के साथ कथित छेड़छाड़ के बावजूद हमें जबर्दस्त जनादेश मिला। अगर तृणकां चुनाव हारी तो यह कहकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर सकती है कि ईवीएम में ही गड़बड़ थी!

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चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल जीते या हारे, उसे जनता, चुनाव आयोग और व्यवस्थाओं पर विश्वास होना ही चाहिए। इन पर अविश्वास करने का मतलब है- लोकतंत्र पर अविश्वास। यह स्वीकार्य नहीं है। जब चुनाव जीतें तो सब ठीक, जब चुनाव हारें तो गड़बड़! ऐसा नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दलों को एक और बात याद रखनी चाहिए। अपनी सत्ता के इतिहास के आधार पर यह सपना न देखें कि भविष्य ऐसा ही होगा। लोकतंत्र में जब जनता वर्षों से सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों को उखाड़ फेंकती है तो उनकी वापसी आसान नहीं होती है। पश्चिम बंगाल किसी ज़माने में कांग्रेस का गढ़ होता था। उसके बाद सीपीआई (एम) ने दशकों शासन किया। आज बंगाल में इन दोनों राजनीतिक दलों की स्थिति किसी से छिपी हुई नहीं है। इन चुनावों में जो भी राजनीतिक दल जीते, उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि अगर आप जनता से दूर जाएंगे तो जनता आपको सत्ता से दूर कर देगी; चाहे आपके नेता कितने ही महान हों। चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक दलों की सर्वोच्च प्राथमिकता जनकल्याण होना चाहिए। इसमें किसी तरह का भेदभाव न हो। भाषावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और सांप्रदायिकता से क्षणिक सफलता ही मिल सकती है। उसकी नींव खोखली होती है। एक बार जब जनता को समझ में आ जाता है कि कोई राजनीतिक दल फूट डालकर सत्ता का सुख प्राप्त करना चाहता है तो उसके दांव-पेच किसी काम नहीं आते। चुनाव जीतकर मनमानी न करें। ऐसे कदम उठाएं, जो जनता का जीवन स्तर बेहतर बनाएं। आज आम आदमी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध समेत दर्जनों समस्याओं से परेशान है। राजनीतिक दल चुनाव जीतकर इनका समाधान करें, न कि अगले चुनाव की तैयारी में लग जाएं। अगर जनकल्याण की भावना के साथ काम करेंगे तो अगले चुनाव की चिंता करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

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