मजबूती से खड़ा है भारत
अमेरिका की अपनी जरूरतें हैं, भारत की अपनी जरूरतें हैं
जिसे जहां अपने हित सुरक्षित महसूस होंगे, वह वहां जाएगा
ईरान से अमेरिका-इज़राइल की भिड़ंत के बाद देश-दुनिया में कई नेता बेसिर-पैर के बयान कुछ ज्यादा ही देने लगे हैं। उनके शब्दों से स्पष्ट होता है कि या तो उन्हें स्थिति की पर्याप्त जानकारी नहीं है या वे जानबूझकर लोगों को भ्रमित करना चाहते हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का यह दावा हैरान करने वाला है कि 'केंद्र सरकार की नीतियों के कारण भारत ऐसी स्थिति में है, जहां अमेरिका यह तय करता है कि उसे आवश्यक वस्तुओं का आयात कहां से करना चाहिए और देश अमेरिका का 'गुलाम' या 'जूनियर पार्टनर' बन गया है।' वरिष्ठ नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि उन्हें सरकार चलाने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जानकारी होगी। प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री जब कोई फैसला लेते हैं तो उसके दायरे में 140 करोड़ से ज्यादा देशवासी आते हैं। उनके हितों की रक्षा और भलाई को सदैव ध्यान में रखना होता है। इसके लिए विभिन्न देशों के साथ संबंधों को निभाना पड़ता है। इसके तहत कुछ शर्तें दूसरों की माननी होती हैं, कुछ शर्तें अपनी मनवानी होती हैं। साझा हितों के आधार पर दुनिया चलती है। यह सोचना भी बेबुनियाद है कि भारत किसी देश का गुलाम बन गया है। अमेरिका हर साल अरबों डॉलर कीमत का सामान भारत से आयात करता है। उसकी बड़ी-बड़ी कंपनियों के अधिकारी भारतीय मूल के लोग हैं। क्या इस आधार पर यह कह सकते हैं कि अमेरिका, भारत का गुलाम बन गया है? अमेरिका की अपनी जरूरतें हैं, भारत की अपनी जरूरतें हैं। जिसे जहां अपने हित सुरक्षित महसूस होंगे, वह वहां जाएगा। इसमें नई बात क्या है? कई लोगों की यह शिकायत है कि भारत सरकार अमेरिका-इज़राइल की (उनके द्वारा सुझाए गए शब्दों के अनुसार) कड़ी निंदा क्यों नहीं करती है? इसका जवाब बहुत आसान है- यह लड़ाई भारत ने शुरू नहीं करवाई है। दोनों पक्षों ने सिर्फ अपनी दुश्मनी देखी, लेकिन भारत सरकार को अपने 140 करोड़ से ज्यादा लोगों की भलाई देखनी है। अगर यहां ज़रा-सी समस्या हुई तो लोग प्रधानमंत्री मोदी से जवाब मांगेंगे, ट्रंप, नेतन्याहू या मोज्तबा खामेनेई से नहीं।
एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के इन शब्दों में राजनीतिक परिपक्वता का अभाव झलकता है- 'आप ट्रंप और नेतन्याहू के साथ क्यों बैठे रहे? क्या यही हमारी विदेश नीति है?' ओवैसी की तरह कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं- 'ईरान पर हमले शुरू होने से दो दिन पहले मोदी इज़राइल क्यों गए थे?' यह तो वही बात हुई कि आप किसी मित्र के यहां कार्यक्रम में जाएं। दो दिन बाद उसका किसी ऐसे व्यक्ति से झगड़ा हो जाए, जिसके साथ वर्षों से दुश्मनी चली आ रही थी। संयोगवश वह व्यक्ति आपका भी परिचित निकल आए! क्या इसके लिए आप जिम्मेदार हो जाएंगे? दुनिया में छोटे-बड़े संघर्ष चलते रहते हैं। वे कब भीषण सैन्य टकराव में बदल जाएंगे, इसकी सटीक भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। अगर उन देशों के साथ भारत के संबंध होंगे तो भारतीय नागरिकों के जीवन पर असर पड़ सकता है। हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। आज पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देश लड़ रहे हैं, जो कल तक बहुत गहरे दोस्त नजर आते थे! रूस-यूक्रेन युद्ध चल रहा है। यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की को भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने पर आपत्ति है। उन्हें आशंका है कि इससे रूस को युद्ध के लिए लगभग 10 अरब डॉलर मिल सकते हैं। जेलेंस्की अपने गलत फैसलों के लिए भारत समेत अन्य देशों को संकट में क्यों डालना चाहते हैं? अगर भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा तो दुनिया में ईंधन के दाम आसमान छूएंगे। जिन पश्चिमी देशों ने अमेरिका के दबाव में आकर रूस पर प्रतिबंध लगाए थे, उन्होंने ईंधन संबंधी जरूरतों पर ठीक तरह से विचार ही नहीं किया था। उन्हें भारत का आभार मानना चाहिए, जिसकी रिफाइनरियों ने कई देशों को ईंधन संकट से बचा लिया। पश्चिम एशिया में छाए गहरे संकट के बावजूद भारत मजबूती से खड़ा है और नई दृष्टि के साथ आगे बढ़ रहा है। इससे करोड़ों लोग लाभान्वित होंगे।

