कश्मीरी पंडितों की किसे परवाह?

कश्मीर में सिर्फ पर्यटकों का नहीं, कश्मीरी पंडितों का भी स्वागत करें

कश्मीरी पंडितों की किसे परवाह?

उनके जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करें

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों का घाटी में 'हमेशा स्वागत' संबंधी जो बयान दिया है, उससे कई सवाल पैदा होते हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि किन वजहों से कश्मीरी पंडितों को अपने घर छोड़ने पड़े थे? अगर आज वे अपने घरों में रहने के लिए आ जाएं तो क्या कोई सुरक्षा की गारंटी देगा? अक्सर नेतागण चर्चा का केंद्र बनने के लिए बड़े-बड़े बयान तो दे देते हैं, लेकिन वे हकीकत से कोसों दूर रहते हैं। कश्मीरी पंडित अपनी धरती पर सदियों से आबाद थे। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, साहित्य, संगीत, समाजसेवा और विभिन्न क्षेत्रों में महान योगदान दिया था। यह मानवता का दुर्भाग्य रहा कि उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा। राजनीतिक पार्टियों ने इस मुद्दे को खूब भुनाया, अपना वोटबैंक बनाया। इन सबसे कश्मीरी पंडितों को क्या मिला? लंबे-लंबे भाषण और कोरे आश्वासन! जो आज तक मिल रहे हैं। कश्मीरी पंडितों के साथ बहुत बड़ा जुल्म हुआ था। जो पश्चिमी मीडिया हर बात पर भारत को उपदेश देने के लिए अपने पन्ने रंग देता है, वह उस समय क्या लिख रहा था? उसने गहरी चुप्पी साध रखी थी। इतिहास उन लेखकों और नेताओं से भी सवाल पूछेगा, जो उस समय खामोश रहे थे। कश्मीरी पंडित एक स्वाभिमानी कौम है। इसने इतनी बड़ी ज्यादती बर्दाश्त करने के बावजूद खुद को अपने पैरों पर खड़ा किया। कश्मीरी पंडित शिक्षा और मेहनत की बदौलत भारत समेत कई देशों में प्रतिष्ठित पदों पर काम कर रहे हैं। इनसे मकान, दुकान, खेत, खलिहान और परिवार के सदस्यों की जान तक छीनी गई, लेकिन कोई कश्मीरी पंडित कश्मीर के लिए और भारत के लिए कभी आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करता दिखाई नहीं देगा।

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जब कभी कश्मीरी पंडितों का मुद्दा उठाया जाता है तो एक बात सभी पार्टियों को याद रखनी चाहिए- अब उन्हें आपकी हमदर्दी की कोई जरूरत नहीं है। पार्टियां उस घटनाक्रम के लिए आरोप-प्रत्यारोप की बौछार करती रहती हैं। वे दिखाना चाहती हैं कि कश्मीरी पंडितों का हमसे बड़ा कोई शुभचिंतक नहीं है। उस समय नेता कहां थे, अधिकारी कहां थे - ये सवाल अपनी जगह हैं। इनसे बड़ा सवाल है- कश्मीरी पंडितों के पड़ोसी कहां थे? उनके जीवन की रक्षा करने की सबसे पहली जिम्मेदारी पड़ोसियों पर थी। क्या वे उन्हें बचाने के लिए आगे आए थे? अगर उनके पड़ोसी ही एकजुट होकर खड़े हो जाते तो कट्टरपंथियों की क्या हैसियत रह जाती? आज फारूक अब्दुल्ला के ये शब्द हास्यास्पद लगते हैं, 'वे कब लौटेंगे? उन्हें कौन रोक रहा है? कोई उन्हें नहीं रोक रहा है। उन्हें वापस आना चाहिए, क्योंकि यही उनका घर है।' परिस्थितियां इतनी ही आसान होतीं तो सारे कश्मीरी पंडित अब तक अपने पूर्वजों की भूमि पर लौट आते। अगर फारूक अब्दुल्ला सच में चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित अपने घर लौटें तो पहले उनके लिए अनुकूल माहौल बनाएं। उनके जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करें। यह काम सिर्फ सुरक्षा बलों के बूते नहीं हो सकता। बंदूकों का पहरा लगाकर दी गई सुरक्षा असल सुरक्षा नहीं होती। यह उसी स्थिति में संभव है, जब आम कश्मीरी इसके लिए तैयार हो। जो सुरक्षा की भावना समाज के अंदर से आती है, वह कहीं और से नहीं आ सकती। कौन अपने घर नहीं लौटना चाहता? पंछी तक को अपने घर से गहरा लगाव होता है। क्या इन्सान को लगाव नहीं होता? कश्मीर में सिर्फ पर्यटकों का नहीं, कश्मीरी पंडितों का भी स्वागत करें। उन्हें वहां दोबारा बसाएं।

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