इतिहास न भूलें, एकजुट रहें

अगर लोग 'मैं' और 'मेरा' तक सीमित रहेंगे तो देश मजबूत नहीं होगा

इतिहास न भूलें, एकजुट रहें

'हम सब एक हैं' - यह भावना होनी चाहिए

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) में सुधा मूर्ति के शब्द - 'बच्चे जानें कि बंटवारा गलत था, इसे कभी दोहराया नहीं जाना चाहिए' - हर उम्र के नागरिकों, खासकर युवाओं को बहुत गहरा संदेश देते हैं। बंटवारा एक ऐसा घाव है, जो हमें आज भी दर्द दे रहा है। हमारे लिए देश सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है। हम इसे भारत मां कहते हैं। वर्ष 1947 में अंग्रेजों की चालाकी और कुछ नेताओं के कुर्सीप्रेम के कारण बंटवारा हुआ था, जिसमें लाखों लोग मारे गए थे। हमें उस घटना को भूलना नहीं चाहिए। जो आज़ादी हमें मिली थी, वह मुफ्त में नहीं आई थी। इसके लिए हमारे देशवासियों ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई थी। इस आज़ादी की रक्षा करने के लिए जरूरी है कि हमें अपना इतिहास याद रहे। 'बंटवारा कैसे हुआ था', से बड़ा सवाल है- 'बंटवारा क्यों हुआ था?' इसके लिए सिर्फ अंग्रेजों को दोष नहीं दिया जा सकता। वे यहां कोई समाजसेवा करने नहीं आए थे। उनका मकसद था- भारत को लूटना और ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाना। वे उसमें कामयाब रहे। हमारे पूर्वजों को समय रहते उन दोषों और कमियों को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए था, जिन्होंने देश में बहुत गहराई तक जड़ें जमा ली थीं। अंग्रेज घोर लालची थे, अव्वल दर्जे के कपटी थे। उन्होंने 'फूट डालो, राज करो' की नीति अपनाई थी। उनके पास विज्ञान की भी ताकत थी। अगर कोई ताकत दुष्ट के हाथ में होती है तो उसका नुकसान सज्जन को उठाना पड़ता है। टेलीग्राफ, रेलवे, बेहतर बंदूकें, सटीक नक्शे, चिकित्सा शोध, बेहतर आपूर्ति प्रणाली आदि ने भारत पर उनकी पकड़ को मजबूत किया था। अगर हमारे पूर्वजों के पास इनसे बेहतर व्यवस्था होती तो आज देश का नक्शा कुछ और होता।

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अगर लोग 'मैं' और 'मेरा' तक सीमित रहेंगे तो देश मजबूत नहीं होगा। 'हम सब एक हैं' - यह भावना होनी चाहिए। अगर आप वर्ष 1945 से लेकर 1947 तक की पत्रिकाएं पढ़ेंगे (जिनके कई अंक ऑनलाइन उपलब्ध हैं) तो पाएंगे कि उस दौर के अनेक लेखक बंटवारे का विरोध कर रहे थे। वे राष्ट्रीय एकता पर जोर दे रहे थे। वे कह रहे थे कि अगर बंटवारा हुआ तो समस्याएं कम नहीं होंगी, बल्कि बढ़ेंगी। उनकी बातें लोगों को समझ में आती थीं, लेकिन जैसे ही जिन्ना और उनके समर्थक अपने भाषणों में आग उगलते, झगड़े-फसाद शुरू हो जाते थे। महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल जैसे असंख्य महापुरुषों ने देशवासियों को एकजुट रखने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था, लेकिन चंद स्वार्थी तत्त्व बंटवारा करके ही माने। उस समय बड़े-बड़े रईस एक ही रात में सड़क पर आ गए थे। पेशावर, लाहौर, कराची जैसे शहरों में उनकी हवेलियां देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां रहने वालों के क्या ठाठ रहे होंगे! जब बंटवारा हुआ तो जमीनें, हवेलियां, माल-मवेशी, कई पीढ़ियों से जमे-जमाए कारोबार, रुपए, गहने, सोना, चांदी सबकुछ छोड़कर आना पड़ा। देश के साधन-संपन्न वर्ग को समझना चाहिए कि आपकी दौलत तब तक ही सुरक्षित है, जब तक समाज आपके साथ खड़ा है। समाज के हटते ही दौलत और सम्मान किसी काम के नहीं रह जाते। ढाका, सोनारगांव, राजशाही, नारायणगंज, कुमिल्ला, मैमनसिंह की जिन हवेलियों में कभी आम लोग कदम रखने से भी डरते थे, आज वे किस हालत में हैं? हमें अपनी कमियों को दूर करना चाहिए। साथ ही, ऐसे तत्त्वों से सावधान रहना चाहिए, जो अपने स्वार्थों के लिए समाज में नफरत और बंटवारे के बीज बोते हैं। आपसी प्रेम, भाईचारे और सद्भाव से ही देश अखंड रहता है।

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