इतिहास दोहराएगा ईरान?
रेज़ा पहलवी से ज्यादा उम्मीदें लगाना जल्दबाजी होगी
गोली खाए जनता और सत्ता पाए रेज़ा!
ईरान में देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान मृतकों का बढ़ता आंकड़ा संकेत देता है कि इस बार ईरानियों ने 'कुछ बड़ा' करने का निश्चय कर लिया है। सर्वोच्च नेता खामेनेई रहेंगे या जाएंगे, जैसे सवालों के बीच रेज़ा पहलवी को उम्मीद की किरण के रूप में देखा जा रहा है। भारत में कई लोग उन्हें उदारवादी चेहरा बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में काफी लिखा जा रहा है। बेशक खामेनेई के शासन में ढेरों खामियां हैं, लेकिन रेज़ा पहलवी से ज्यादा उम्मीदें लगाना जल्दबाजी होगी। लगभग सवा साल पहले मोहम्मद यूनुस भी उदारवादी चेहरा थे। नोबेल पुरस्कार विजेता होने के कारण उनसे लोगों ने ज्यादा ही उम्मीदें लगा ली थीं। नतीजा क्या निकला? वे हर मोर्चे पर नाकाम साबित हुए। रेज़ा पहलवी अमेरिका में रहते हैं और ईरान के क्राउन प्रिंस कहलाना पसंद करते हैं। वे आह्वान कर रहे हैं कि ईरान की जनता हड़ताल करे, शहरों पर कब्जा करे ... उसके बाद वे स्वदेश लौटेंगे। यानी गोली खाए जनता और सत्ता पाए रेज़ा! जो लोग सोशल मीडिया पर ईरान के पुराने और कथित खुशहाल दौर की तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि इन तस्वीरों का एक पहलू और है, जिसकी तरफ किसी की नजर नहीं जा रही है। मोहम्मद रेज़ा पहलवी के शासन में कट्टरपंथ पर काफी हद तक नियंत्रण था, लेकिन जनता परेशान थी। गरीबी ज्यादा थी और आम लोग बमुश्किल पेट भर पाते थे। वहीं, मो. रेज़ा पहलवी को अपने ऐशो-आराम से ही फुर्सत नहीं थी। वे बड़ी-बड़ी पार्टियां करने के शौकीन थे, जिनमें देश का धन लुटाया जाता था। जनता ने उनसे त्रस्त होकर ही क्रांति की थी, जिसके नतीजे में रुहोल्लाह खुमैनी और उनके समर्थकों के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ था।
ईरान के लोगों ने किसी कालखंड में उपासना के तौर-तरीके जरूर बदल लिए, लेकिन उनके जीवन पर प्राचीन संस्कृति का प्रभाव है। वे बहुत सख्त अनुशासन के आदी नहीं रहे हैं। उन्हें उत्सव मनाना, पिकनिक पर जाना, संगीत सुनना और फिल्में देखना बहुत पसंद है। वहां भारतीय फिल्में खूब देखी जाती हैं। सर्वोच्च नेता खामेनेई अपने ही देशवासियों को नहीं समझ पाए। वे उन पर कई तरह की बंदिशें थोपते रहे। जब बंदिशें एक हद से ज्यादा हो जाती हैं तो लोग प्रतिक्रिया देते हैं। किसी देश में अनुशासन स्थापित करने का यह मतलब नहीं कि लोगों का जीना मुश्किल कर दें। खामेनेई महंगाई को नियंत्रित नहीं कर सके। वे डॉलर के बढ़ते भाव को नकेल नहीं डाल सके। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं दे रहे। वे वैज्ञानिक विकास नहीं दे रहे। वे लोगों को कोई उम्मीद भी नहीं दे रहे। अगर लोग हल्की-सी आवाज उठाते हैं तो उनका बेदर्दी से दमन किया जाता है। ऐसे में वे विद्रोह न करें तो क्या करें? खामेनेई बहुत अनुभवी नेता हैं। उन्हें जरूर पता होगा कि एक बिंदु के बाद लोगों के मन से डर खत्म हो जाता है। फिर, मौत का डर भी नहीं रहता। ईरान के अटॉर्नी जनरल प्रदर्शनकारियों को मृत्युदंड का डर दिखा रहे हैं! क्या ऐसी धमकियों से प्रदर्शन खत्म होते हैं? जनता को धमकियां देने के बजाय उसकी बात सुनें। अगर इस बार प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक दबा देंगे तो यह न समझें कि भविष्य में शांति रहेगी। सालभर बाद फिर कोई मुद्दा उठेगा। वह विद्रोह भड़काने में चिंगारी का काम करेगा। खामेनेई कितने लोगों पर गोलियां चलाएंगे और कब तक चलाएंगे? आम आदमी का विश्वास जीतकर, उसका जीवन आसान बनाकर ही कोई शासक यशस्वी हो सकता है। अपने नागरिकों पर ज्यादा सख्ती से हालात सुधरते नहीं, बल्कि बिगड़ते हैं। जनता ने कई सम्राटों और तानाशाहों के सिंहासन उलट दिए। अगर ईरान में भी यही इतिहास दोहराया जाए तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

