सिंध और हिंद

हमारे लिए श्रीराम मंदिर आस्था के साथ ही इतिहास से जुड़ा हुआ अध्याय भी है

सिंध और हिंद

विदेशी आक्रांताओं ने सिंध को बहुत लहूलुहान किया था

उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ का यह बयान कि 'अगर पांच सौ वर्षों के बाद राम जन्मभूमि वापस ली जा सकती है, तो कोई कारण नहीं कि हम ‘सिंधु’ (सिंध प्रांत) वापस न ले पाएं', विचारणीय है। दुर्भाग्य रहा कि इतने वर्षों तक लोग तो अपने बंगलों-मकानों में रहे, लेकिन प्रभु श्रीराम को अपनी ही नगरी में मंदिर के लिए बहुत लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी। अंतत: उच्चतम न्यायालय से न्याय हुआ और भव्य मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया। 

अब, कुछ महीनों की बात और है। फिर, प्रभु श्रीराम के दर्शन सबके लिए सुलभ होंगे। हमारे लिए श्रीराम मंदिर आस्था के साथ ही इतिहास से जुड़ा हुआ अध्याय भी है। इससे युवा पीढ़ी को यह पता चला कि इस भारत भूमि पर विभिन्न कालखंडों में ऐसा क्या-क्या हुआ, जिसके कारण हमारी आस्था को चोट पहुंचाई गई, हमारे आराध्य को सदियों तक मंदिर निर्माण की प्रतीक्षा करनी पड़ी! इसी तरह, हमें इतिहास और वर्तमान, दोनों का ज्ञान रखते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि सिंध के बिना हिंद नहीं है। सिंध को हमारी संस्कृति, आस्था, इतिहास, दर्शन ... से अलग नहीं किया जा सकता। 

विदेशी आक्रांताओं ने सिंध को बहुत लहूलुहान किया था। भारत-विभाजन के बाद तो सिंध में अल्पसंख्यक असहाय ही हो गए। वहां आए दिन बच्चियों के अपहरण और जबरन धर्मांतरण की घटनाएं हो रही हैं। पाकिस्तानी हुक्मरान सिंधी संस्कृति को नष्ट कर कट्टर विचारधारा थोपने की कोशिशें कर रहे हैं। कभी सिंध के गांव-गांव में कई मंदिर थे, आज वे अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। 

जिस सिंध के व्यापार-वाणिज्य से घर-घर में समृद्धि आती थी, आज वहां खूंखार आतंकवादियों और डाकुओं के अड्डे बन चुके हैं। वहां हिंदू तो गिनती के रह गए, जिनके घरों पर हर महीने हमलों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं। सिंध की प्राचीन इमारतों के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। उन्हें ढहाकर शॉपिंग मॉल खड़े किए जा रहे हैं। सिंध का बुद्धिजीवी वर्ग यह सोचकर हैरान है कि उनके साथ क्या हुआ, वे क्या थे और अब क्या हो गए!

जब हमारे युवाओं को भारत का इतिहास पढ़ाएं तो यह भी जरूर पढ़ाएं कि कराची, पेशावर, लाहौर, क्वेटा ... आदि हमसे कैसे छीने गए? उन्हें यह भी बताएं कि कराची का पंचमुखी हनुमान मंदिर, कटासराज का शिव मंदिर, बलोचिस्तान का हिंगलाज मंदिर और पीओके स्थित शारदा पीठ ... हमसे कैसे अलग किए गए? आज ढाकेश्वरी मंदिर में दर्शन के लिए हमें वीजा-पासपोर्ट की जरूरत क्यों पड़ती है? 

जब हम इन प्रश्नों पर मनन करेंगे, इनके उत्तर ढूंढ़ेंगे तो ही अपने भविष्य को सही दिशा दे पाएंगे। आज जब पाकिस्तान में खुदाई के दौरान प्राचीन मंदिर के अवशेष निकल आते हैं तो यहां कई लोग इसी से खुश हो जाते हैं। संभवत: वे इसे अपने इतिहास की प्राचीनता को सिद्ध करने के लिए एक और प्रमाण के तौर पर लेते हैं, जबकि उन्हें इस बात पर चिंतन करना चाहिए कि ऐसा क्या कारण रहा होगा कि ये भव्य मंदिर इस स्थिति में पहुंचे? हमारे उन पूर्वजों के साथ क्या हुआ था? हमारा इतिहास तो बहुत प्राचीन है ही, इसमें क्या संदेह है! 

हमें भविष्य के लिए भी चिंतन करना होगा, योजना बनानी होगी। भारत माता को विभाजन से जो पीड़ा हुई, वह मिटी नहीं है, बल्कि अब उसकी संतानें (भारतवासी) आतंकवाद की पीड़ा से त्रस्त हैं। हमें इनका उपचार ढूंढ़ना होगा। भारत माता को वही वैभव पुन: लौटाना होगा। आतंकवाद को नष्ट कर भारत मां के शीश पर संपूर्ण जम्मू-कश्मीर के रूप में भव्य मुकुट स्थापित करना होगा। उसकी 'दोनों भुजाओं' को 'आभूषणों' से सुसज्जित करते हुए पुन: प्रतिष्ठित करना होगा। 

यह कोई एक दिन या एक साल का काम नहीं है और न ही सिर्फ सरकारों की जिम्मेदारी है। जब बड़े फैसले लिए जाते हैं तो उसमें दशकों लग जाते हैं। यह काम कठिन जरूर है, असंभव बिल्कुल नहीं है। हां, दृढ़ प्रतिज्ञ लोग प्रतीक्षा करते हैं, वे निराश नहीं होते। ऐसे लोग ही इतिहास की धारा को मोड़ते आए हैं।

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