बच्चे न वेटलिफ्टर हैं, न बस्ता ढोने वाले : मद्रास हाईकोर्ट

बच्चे न वेटलिफ्टर हैं, न बस्ता ढोने वाले : मद्रास हाईकोर्ट

चेन्नई/दक्षिण भारतमद्रास हाईकोर्ट ने छोटे बच्चों पर से बस्ते और होमवर्क का बोझ हटाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चे न तो वेटलिफ्टर हैं और न ही किताबों से भरे स्कूल बैग ढोने वाले। अदालत ने केंद्र सरकार से सभी राज्यों को पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के बस्ते का भार घटाने और होमवर्क न देने का निर्देश जारी करने को कहा है। उच्च न्यायालय ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से चार हफ्ते में अनुपालना रिपोर्ट देने को कहा है।अपने अंतरिम आदेश में अदालत ने राज्य सरकारों से कहा कि वह सुनिश्चित करें कि बस्ते का भार बच्चों के भार से १० फीसदी से ज्यादा न हो। न्यायाधीश एन किरुबकरण ने तेलंगाना और महाराष्ट्र सरकारों के आदेश का हवाला देते हुए केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वह सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को चिल्ड्रन स्कूल बैग पॉलिसी’’ को लागू करने का निर्देश दे। न्यायालय ने कहा कि संविधान की धारा २१ के तहत बच्चों को यह मौलिक अधिकार है कि उन्हें उनकी उम्र के अनुसार न्यूनतम घंटे तक सोने दिया जाए जिससे उनकी नींद पूरी हो सके। न्यायालय ने कहा कि यदि बच्चों को समुचित ढंग से सोने नहीं दिया जाएगा तो उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव प़डेगा। इसके साथ ही बच्चों के पांच वर्ष के होने तक उन्हें पेन या पेंसिल पक़डने के लिए भी मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।न्यायालय ने केन्दीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी और एसोसिएशन ऑफ मैनेजमेंट ऑफ प्राइवेट स्कूल को निर्देश दिया है कि वह बच्चों को राष्ट्रीय शिक्षा एवं शोध प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी)के पाठ्यक्रमों किताबें ही प़ढने को कहें और उन्हीं का इस्तेमाल करें। न्यायालय ने कहा कि बच्चों को पढाने के लिए निर्धारित पुस्तकांें के अलावा उन्हें दूसरी किताबें नहीं पढाई जानी चाहिए क्योंकि इससे उन पर मानसिक दबाव पैदा होगा और उनका मानसिक विकास प्रभावित होने की संभावना है। न्यायाधीश किरुबकरण ने याचिकाकर्ता एवं वकील एम पुरुषोत्तमन की याचिका यह फैसला सुनाया।जब यह याचिका सुनवाई के लिए आई तो न्यायाधीश किरुबाकरण ने कहा कि मौजूदा समय में अभिभावक और शिक्षक बच्चों को लेकर काफी महत्वाकांक्षी हो चुके हैं और इसके कारण बच्चों की मासूमियत खो रही है। बच्चे परीक्षाओं में बेहतर अंक प्राप्त कर सकें इसलिए उन्हें ऐसी किताबें पढाई जा रही है जो उनके उम्र से अधिक उम्र के बच्चों के लिए है। बच्चे भी शिक्षकांे और माता-पिता के दबाव में आकर इन पुस्तकों की पाठ्य सामग्री को समझने के बदले उसे रट लेते हैं जिससे बच्चों को कोई फायदा नहीं होता। न्यायालय ने निर्देश दिया है कि अदालत द्वारा जारी इस निर्देश को अकादमिक सत्र वर्ष २०१८-१९ में लागू कर दिया जाना चाहिए।न्यायालय ने स्कूली शिक्षा विभाग के अधिकारियों को यह निर्देश दिया है कि वह छोटे बच्चों को शिक्षा देने वाले सभी सरकारी और निजी स्कूलों को अदालत के इस आदेश के बारे में बताएं और उन्हें इन निर्देशों का पालन करने के लिए कहें। इसके साथ ही स्कूली शिक्षा विभाग के अधिकारियों को समय-समय पर ऐसे स्कूलों का दौरा करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि इन दिशा निर्देशों का स्कूलों द्वारा पालन किया जा रहा है या नहीं। छोटे बच्चों को पढाने वाले जिन स्कूलों द्वारा इन दिशा निर्देशों का पालन करने वाले स्कूलों पर कार्रवाई की जानी चाहिए जिससे स्कूलों में यह संदेश जा सके कि अगर वह बच्चों पर दबाव पैदा करते हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

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