वैश्विक संघर्षों की मूल वजह स्वार्थ और वर्चस्व की चाह: मोहन भागवत

उन्होंने कहा कि भारत मानवता में विश्वास करता है

वैश्विक संघर्षों की मूल वजह स्वार्थ और वर्चस्व की चाह: मोहन भागवत

Photo: RSSOrg FB Page

नागपुर/दक्षिण भारत। आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि विश्व में संघर्षों की जड़ स्वार्थी इच्छाएं और वर्चस्व की लालसा हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के पालन के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।

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नागपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि पिछले 2,000 वर्षों से विश्व ने संघर्षों को हल करने के लिए विभिन्न विचारों का प्रयोग किया है, लेकिन इसमें बहुत कम सफलता मिली है। 

आरएसएस प्रमुख शहर में विश्व हिन्दू परिषद के कार्यालय की नींव रखे जाने के बाद सभा को संबोधित कर रहे थे। भागवत ने कहा कि भारत की प्राचीन विद्या सिखाती है कि 'सभी जुड़े हुए और एक हैं'। उन्होंने संघर्ष से सद्भाव और सहयोग की ओर परिवर्तन की अपील की। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आधुनिक विज्ञान धीरे-धीरे इस समझ की ओर बढ़ रहा है।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि स्वार्थी इच्छाएँ और वर्चस्व की लालसा विश्व में संघर्षों की जड़ हैं।  उन्होंने कहा कि स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के पालन के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।

आचरण के महत्त्व को उजागर करते हुए भागवत ने कहा कि धर्म केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि यह लोगों के व्यवहार में भी प्रतिबिंबित होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अनुशासन और नैतिक मूल्यों का पालन निरंतर अभ्यास की मांग करता है और अक्सर इसमें व्यक्तिगत कठिनाइयां भी शामिल होती हैं।

उन्होंने कहा कि जहां भारत मानवता में विश्वास करता है, वहीं अन्य लोग अस्तित्व के संघर्ष और सर्वश्रेष्ठ के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। उन्होंने दोहराया कि विश्व को संघर्ष नहीं, बल्कि सद्भाव की आवश्यकता है।

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