भारतीय विशेषज्ञों का विदेश में सेवा देना कितना जरूरी?

भारत के छात्र अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर में पढ़ना चाहते हैं

भारतीय विशेषज्ञों का विदेश में सेवा देना कितना जरूरी?

Photo: PixaBay

संजीव ठाकुर
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विगत कई दशकों में प्रतिभा पलायन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है शिक्षा के क्षेत्र में बड़े शिक्षा संस्थानों में भारी-भरकम खर्च के बाद शिक्षित युवक विदेशों में अपनी सेवाएं प्रदान करने को सदैव तत्पर रहते हैं इसका बड़ा कारण विदेशी मुद्रा की कमाई और विदेशी चकाचौंध के तरफ आकर्षण ही होता है। इससे भारत के आर्थिक तंत्र पर बड़ा भार प्रत्यारोपित होता है। इतना खर्च कर के पढ़ाई करने के बाद भारतीय युवा मस्तिष्क भारत के विकास में योगदान न दें तो देश के लिए विडंबना की भांति है। भारत के इतिहास पर नजर डालें, तो नालंदा, तक्षशिला, शांति निकेतन और पाटलिपुत्र जैसे बड़े शिक्षा के केंद्र रहे हैं। सदैव अलग-अलग देशों से शिष्य शिक्षा प्राप्त करने भारत आते रहे हैं। अब ऐसा क्या हो गया है कि भारत से तकनीकी, चिकित्सकीय और संचार माध्यमों, मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए भारत से लगभग दो से ढाई लाख छात्र विदेश में पढ़ने के लिए जाने लगे हैं। वही भारत सरकार का सदैव प्रयास रहा है की विदेशी छात्र हिंदुस्तान में पढ़ाई के लिए देश में आए और और हिंदुस्तानी डिग्री लेकर अपने देश में लौटे। 

इस तरह भारत सरकार द्वारा भारत को एक बड़ा शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। और किसके लिए एक अभियान फेलोशिप कार्यक्रम चलाया गया है। इसके अलावा सरकार द्वारा एक प्रोजेक्ट डेस्टिनेशन इंडिया भी शुरू किया गया है। जिसके अंतर्गत विदेशी छात्रों की प्रवेश की प्रक्रिया को अत्यंत सरल सुगम बनाना है जिससे ज्यादा से ज्यादा छात्र भारत में पढ़ कर डिग्री हासिल करें अभी वर्तमान में भारत में आसियान देशों के निवासी छात्रों की संख्या लगभग सवा दो लाख के करीब है मानव संसाधन विभाग द्वारा इसे आगामी वर्षों में चार गुना करना चाहती है। आसियान देशों के छात्र भारत में पढ़ने से थोड़ा हिचकिचाते भी हैं, जिसके अनेक कारणों में से अपराधिक गतिविधियां, प्रदूषण, गर्मी, प्रवेश की लंबी लंबी प्रक्रिया, और भारतीय डिग्री की मान्यता नहीं होना भी शामिल है भारत में बारह से चौदह ऐसे शिक्षा संस्थान हैं, जो विश्व के 200 मान्यता प्राप्त संस्थानों में शामिल हैं। 

भारत में शिक्षा प्राप्त करना कम ख़र्च में संभव है, पर भारत के छात्र अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर में पढ़ना चाहते हैं जहां पढ़ने का खर्च डॉलर में यहां से चार गुना पड़ता है। जबकि भारत में आए छात्रों का पढ़ाई तथा खाने-पीने रहने का खर्च लगभग एक चौथाई होता है, फिर भी भारत के अभिभावक अपने बच्चों को विदेश भेजने में वरीयता देते हैं। भारत द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहा है कि भारत के विश्वविद्यालयों की शिक्षा की गुणवत्ता विदेशी स्तर पर हो,पर इसमें काफी समय लगने की गुंजाइश भी है।यह भी संभव होगा कि विदेशी विश्वविद्यालयों की शाखाएं भारत में खोल दी जाए, और भारत के छात्र भारत में ही रह कर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें। असल चिंता की बात यह है कि विदेश में जाने वाले छात्र वहां पढ़कर वही के संस्थानों में अपनी नौकरी खोज कर वहीं रहने लगते है। दूसरा यह है कि यहां की तकनीकी टॉप संस्थानों के होनहार युवक विदेशों में मोटी मोटी तनख्वाह में नौकरी देख कर विदेश चले जाते हैं, इस तरह भारत सरकार का उन पर किए जाने वाला खर्च का फायदा भारतीय संस्थानों को ना होकर विदेशी संस्थाएं उठा ले जाती है। 

इस तरह प्रतिभा पलायन भारत के लिए और भारतीय शिक्षा पद्धति तथा भारतीय विश्वविद्यालयों के लिए नुकसानदेह भी है। भारत ने आसियान देशों के एक हजार छात्रों के लिए फैलोशिप कि 2018 में योजना बनाकर राशि आवंटित की थी। हर साल 200 से 300 छात्रों को बड़े तकनीकी संस्थानों में डॉक्टरेट की उपाधि देने की योजना बनाई थी। पर बीते वर्ष केवल आसियान देशों के 45 छात्रों ने पंजीयन करवाया था,इस तरह विकासशील देशों के छात्र भी भारत में पढ़ाई के लिए आकर्षित नहीं हो रहे हैं। मानव संसाधन विभाग को उच्च शिक्षा उपयोगी और व्यवसायिक शिक्षा के रूप में दी जानी चाहिए, जिस की उपयोगिता रोजमर्रा के कामों में हो सके और शिक्षा के माध्यम से युवकों को शत-शत रोजगार प्राप्त हो सके। तभी प्रतिभा पलायन में अंकुश लग हमारी शिक्षा पद्धति की उपयोगिता बढ़ेगी।

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