कल्पना ज्यादा, वास्तविकता कम

फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर की सियासत और समस्याओं को बहुत करीब से देखा है

कल्पना ज्यादा, वास्तविकता कम

सशक्त और समर्थ भारत ही शांति स्थापित कर सकता है

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने इस केंद्रशासित प्रदेश में हाल में हुईं आतंकवादी घटनाओं के बाद पाकिस्तान के साथ जिस तरह बातचीत शुरू करने की वकालत की है, उसमें कल्पना ज्यादा और वास्तविकता कम है। अब्दुल्ला का यह कहना कि 'हमें अभी भी अपने पड़ोसी के साथ समस्याएं हैं ... ये सैन्य कार्रवाई से हल नहीं होंगी', से तो ऐसा प्रतीत होता है कि सारी समस्याएं हमारे द्वारा खड़ी की गई हैं! फारूक अब्दुल्ला वरिष्ठ राजनेता हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर की सियासत और समस्याओं को बहुत करीब से देखा है। इसलिए यह कहना तो उचित नहीं होगा कि वे वास्तविकता से परिचित नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर में कबायली लश्कर किसने भेजे थे? कथित आजादी के नाम पर अलगाववाद और आतंकवाद की आग किसने लगाई थी? पीओके में आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने के शिविर कौन चला रहा है? आतंकवादियों को हथियार और विस्फोटक कौन उपलब्ध कराता है? इन सबका एक ही जवाब है- पाकिस्तान। स्पष्ट है कि ये समस्याएं पाकिस्तान द्वारा खड़ी की गई हैं। इनके समाधान के लिए भारत को क्या करना चाहिए? क्या बातचीत से ये मसले हल हो जाएंगे? एलओसी पार कर रहे आतंकवादियों को गोली मारनी चाहिए या उनसे बातचीत करनी चाहिए? बेशक ऐसे मामलों में सैन्य कार्रवाई करना एकमात्र समाधान नहीं हो सकता, लेकिन हाथ में बंदूक, सीने पर विस्फोटकों से लदी जैकेट और दिलो-दिमाग में नफरत का जहर लेकर आने वाले आतंकवादी का सामना कैसे करना चाहिए? अगर उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे तो वह अनगिनत मासूम लोगों की जान लेगा, इसलिए जहां सैन्य कार्रवाई अनिवार्य हो, वहां इससे पीछे नहीं हटना चाहिए।

यहां पहले भी लिख चुके हैं कि हम भारतवासियों में 'शत्रुबोध' की कमी है। हम पर कई बार विदेशी आक्रांताओं द्वारा हमले किए गए। उन्होंने हमारी आस्था, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, एकता, अखंडता और सामाजिक सद्भाव पर चोट की थी। आज भी यह खतरा टला नहीं है, लेकिन हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो यह कहते मिल जाएंगे कि अगर आतंकवाद को रोकना है तो पाकिस्तान से बातचीत जरूरी है! हमारे शीर्ष नेताओं और अधिकारियों ने वर्ष 1947 से लेकर कई दशकों तक पाकिस्तान से बातचीत की, उसका क्या नतीजा निकला? क्या उससे आतंकवादी घटनाएं बंद हो गईं? हमें हर बातचीत और संबंध सुधारने की हर पहल के बाद पाकिस्तान की ओर से धोखा ही मिला है। इसके बावजूद कुछ 'बुद्धिजीवी' यह तर्क देते मिल जाते हैं कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कड़वाहट इसलिए है, क्योंकि 'कश्मीर एक बड़ा मुद्दा' है ... अगर इसका कोई उचित हल ढूंढ़ लें तो झगड़ा ही नहीं रहेगा!' वास्तव में ऐसी बातें कोरी कल्पनाएं हैं। हमें इस बात को समझना होगा कि भारत-पाक संबंधों में कड़वाहट कश्मीर की वजह से नहीं, बल्कि 'दो क़ौमी नज़रिए' की वजह से है, जो पाकिस्तान की बुनियाद है। जिन्ना ने इसी के नाम पर भारत का विभाजन करवाया था। यह नज़रिया पाकिस्तानी बहुसंख्यकों को हर उस व्यक्ति से नफरत करना सिखाता है, जिसकी आस्था अलग है। अगर दोनों देशों के बीच 'कश्मीर एक मुद्दा' नहीं होता तो पाकिस्तान कोई और मुद्दा खड़ा कर देता। फिर वह किसी-न-किसी कुतर्क के आधार पर पंजाब मांगता, हिमाचल मांगता, राजस्थान मांगता ... और फिर पूरा हिंदुस्तान मांगता। हम पाकिस्तान के लिए कितनी ही आसानियां पैदा कर दें, उसके साथ कितनी ही शांतिवार्ताएं कर लें, वह कभी संतुष्ट नहीं होगा, क्योंकि अगर दोनों देशों के बीच संबंध मधुर हो गए तो 'दो क़ौमी नज़रिया' ग़लत साबित हो जाएगा। इससे पाक की नींव हिल जाएगी। अगर हमें अपने देश और देशवासियों की रक्षा सुनिश्चित करनी है तो 'शत्रुबोध' के संबंध में किसी तरह की ग़लत-फ़हमी में नहीं रहना चाहिए। सशक्त और समर्थ भारत ही शांति स्थापित कर सकता है।

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