डिजिटल डिटॉक्स

धरती को प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन जैसे संकटों से बचाना है, तो उपवास, त्याग, संयम और साधना का मार्ग अपनाना होगा

डिजिटल डिटॉक्स

भारत की आध्यात्मिक परंपराओं में उपवास पर बहुत जोर दिया गया है

अमेरिका में जैन समुदाय द्वारा चलाया जा रहा 'डिजिटल डिटॉक्स आंदोलन' प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है। आज ऐसे आंदोलन की बहुत ज़रूरत है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह हमारा स्क्रीन टाइम बढ़ा है, उससे कई कामों में तेजी तो आई है, लेकिन यहां भी अनुशासन और संयम होना चाहिए। भारत की आध्यात्मिक परंपराओं में उपवास पर बहुत जोर दिया गया है, ताकि तन, मन और जीवन में संतुलन बना रहे, किसी भी तत्त्व की 'अति' से बचा जाए। 'डिजिटल डिटॉक्स आंदोलन' भी एक प्रकार का उपवास है। इससे लोगों के पास यह जानने का अवसर होगा कि मोबाइल फोन और लैपटॉप की स्क्रीन से बाहर भी बहुत कुछ है और सही मायनों में तो दुनिया वही है। आज कई परिवारों में तो यह स्थिति है कि लोगों के पास एक-दूसरे से बात करने के लिए समय नहीं होता। माता-पिता से लेकर छोटे बच्चों तक के पास 'अपने' मोबाइल फोन और लैपटॉप हैं। उन्हें यह तो मालूम होता है कि दुनिया में कहां क्या हो रहा है, कौनसा वीडियो वायरल हो रहा है, लेकिन एक-दूसरे के हालचाल जाने, हंसी-खुशी के माहौल में बात किए बिना हफ्तों बीत जाते हैं! तकनीक का उपयोग जरूरी है, लेकिन वह हमारे रिश्तों, भावनाओं और संवेदनाओं पर हावी नहीं होनी चाहिए। सोशल मीडिया पर प्राय: ऐसे वीडियो देखने को मिलते हैं, जब किसी व्यक्ति के साथ हादसा हो जाता है, तो वहां मौजूद लोग उसकी मदद करने के बजाय वीडियो बनाने लगते हैं! श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक, विवेकानंद ... के देश में यह क्या हो रहा है?

इस देवभूमि पर प्रकट हुए अवतारों, ऋषियों, संतों, मनीषियों ने तो चींटी तक के अधिकार बताए हैं, उसके जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विधान बनाए हैं। दान-पुण्य से ऐसे उपायों को जोड़ा है, जो मनुष्य को प्रकृति के निकट लेकर जाएं, उसमें दूसरों के लिए करुणा पैदा करें। जबकि आज कई लोगों पर 'डिजिटल का मोह' इस कदर हावी हो गया है कि कुछ लाइक्स और शेयर पाने के फेर में उनके पास 'अपनों' के दु:ख-दर्द जानने का समय नहीं होता। पिछले दिनों एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक मकान जलता हुआ नजर आ रहा था। वहां कुछ लोग आग बुझाने में मदद करने के बजाय वीडियो बनाने में व्यस्त थे। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में अगर किसी के यहां ऐसा हादसा होता तो पूरा गांव आग बुझाने के लिए उमड़ पड़ता था। ऐसे वीडियो देखकर लगता है कि हमने कहीं-न-कहीं कुछ खोया है। हमें आत्मबोध की आवश्यकता है। 'डिजिटल डिटॉक्स' जैसे आंदोलन इसमें मददगार साबित होंगे। ऐसे आंदोलनों का और विस्तार किया जा सकता है। हम हफ्ते / महीने में कोई एक दिन ऐसा निर्धारित कर सकते हैं, जब कार जैसे वाहनों के उपयोग से दूर रहें। शास्त्रों में वाणी के संयम और मौन का बहुत महत्त्व बताया गया है। प्राय: कुछ घरों में छोटी-छोटी बातें बड़े झगड़ों में तब्दील हो जाती हैं। क्या हम हर महीने कोई एक दिन या उसके कुछ घंटों तक वाणी के ऐसे संयम का अभ्यास कर सकते हैं? आज जापान में मिनिमलिज्म बहुत लोकप्रिय हो रहा है। यूरोप में भी बहुत लोग इसका पालन कर रहे हैं। जबकि यह तो हजारों वर्षों से हमारे ऋषियों-मुनियों के जीवन का एक हिस्सा रहा है। कम-से-कम वस्तुओं का उपयोग करते हुए जीना और जो वस्तु आवश्यकता से ज्यादा हो, उसे जरूरतमंद को देना ... यह भारतीय संस्कृति है। क्या हम हफ्ते / महीने में किसी एक दिन इसका अभ्यास कर सकते हैं, जब वस्तुओं / संसाधनों का न्यूनतम उपभोग करें? अगर धरती को प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन जैसे संकटों से बचाना है, तो उपवास, त्याग, संयम और साधना का मार्ग अपनाना होगा।

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