उठें, स्वागत करें!

आज का दिन इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। यह भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का दिन है

उठें, स्वागत करें!

यह न्याय एवं सत्य की विजय का भी दिन है

प्रभु श्रीराम आ गए हैं! उठें, स्वागत करें, हमारे आराध्य सबको दर्शन देने के लिए अपने धाम आ गए हैं! रामभक्तों के सदियों के संघर्ष, त्याग और अनेक बलिदानों के बाद यह दिन आया है, जिसकी प्रतीक्षा समस्त रामभक्तों को और न्यायप्रेमियों को थी। आज का दिन इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। यह भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का दिन है। यह न्याय एवं सत्य की विजय का भी दिन है।

लगभग 500 साल पहले जब एक विदेशी आक्रांता के सिपहसालार ने यहां तत्कालीन मंदिर को ध्वस्त करते हुए भारत की आस्था पर चोट कर सामाजिक विघटन के बीज बोने के प्रयास किए थे, उस दिन आंखों में आंसू लिए रामभक्तों ने कहा होगा- ‘वह दिन आएगा, अवश्य आएगा, जब यहां पुनः भव्य मंदिर का निर्माण होगा, जिसमें रामलला विराजमान होंगे और सबको दर्शन देंगे।’ आज उन रामभक्तों के वंशज देख रहे हैं ... हम सब देख रहे हैं ... रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हो गए हैं। आज पूरा विश्व इस मंदिर के कपाट की ओर टकटकी लगाए देख रहा है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस में प्रभु श्रीराम द्वारा लंका-विजय के बाद अयोध्या आगमन का जो दृश्य बताया, वह आज पुनः साकार हो रहा है -

अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा के खानी।।

बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।’

अर्थात् ‘प्रभु श्रीराम को आते जानकर अवधपुरी संपूर्ण शोभाओं की खान हो गई। तीनों प्रकार की सुंदर वायु बहने लगीं। सरयूजी अति निर्मल जलवाली हो गईं।’

‘प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।।

प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।‘

अर्थात् ‘प्रभु श्रीराम को देखकर सब अयोध्यावासी हर्षित हुए। वियोग से उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गए। सब लोगों को प्रेमविह्वल और मिलने के लिए अत्यंत आतुर देखकर खर के शत्रु कृपालु श्रीरामजी ने एक चमत्कार किया।’

वह चमत्कार आज फिर हो रहा है! लेकिन कैसे? तुलसीदासजी द्वारा रचित इन पंक्तियों को आज हम पुनः अक्षरशः साकार होते देख रहे हैं।

‘अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथा जोग मिले सबहि कृपाला।।

कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।’

अर्थात् ‘उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपों में प्रकट हो गए और सबसे (एक ही साथ) यथायोग्य मिले। श्रीरघुवीर ने कृपा की दृष्टि से देखकर सब नर-नारियों को शोक से रहित कर दिया।’ आज जब मंदिर का उद्घाटन होगा तो देश-दुनिया में लोग इंटरनेट के जरिए भी यह कार्यक्रम देखेंगे, भगवान के दर्शन करेंगे। क्या ही शुभ संयोग है कि इस तरह श्रीराम एक ही क्षण में असंख्य रूपों में प्रकट होंगे और सबसे मिलेंगे! ‘

छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।।

एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।’

अर्थात् ‘भगवान क्षणमात्र में सबसे मिल लिए। हे उमा! यह रहस्य किसी ने नहीं जाना। इस प्रकार शील और गुणों के धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे बढ़े।’ निस्संदेह आज कलियुग है, लेकिन श्रीराम अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते। वे आज विज्ञान की दिव्य शक्ति से अपने भक्तों के सामने क्षणमात्र में प्रकट हो जाएंगे! युग बदला है, इसलिए माध्यम ज़रूर बदल गए।

श्रीराम मंदिर आंदोलन प्रारंभ होने से लेकर अदालती दलीलों, सबूतों, फैसलों और प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम तक ऐसे असंख्य प्रसंग हैं, जो युगों-युगों तक सबको प्रेरणा देते रहेंगे। जिस ज़माने में हम पर विदेशी आक्रांता काबिज थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कड़ा प्रतिबंध था, सूचना के (इतने विकसित) साधन नहीं थे, किसी-न-किसी बहाने से हमारी सांस्कृतिक चेतना पर आघात हो रहे थे, हुक्मरानों की क्रूरता और दमनकारी नीतियों के कई तूफान आ रहे थे ...  इन सबके बावजूद हमारे पूर्वजों के हृदय में एक ज्योति जलती रही।

यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही, क्योंकि यह भक्ति की शक्ति से प्रज्वलित हो रही है। इस ज्योति से अभी बड़े-बड़े काम करने हैं। आतंकवाद, अत्याचार व भ्रष्टाचार की कलुषिता को मिटाना है। दासता के कालखंड में हमने जो कुछ खोया, उसे फिर से पाना है। भारत को विश्वगुरु बनाना है।

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