गांवों में पर्यटन

भारत के हर जिले में ऐसे गांव हैं, जो अपने इतिहास, विशिष्ट कला, प्राकृतिक सौंदर्य, खानपान की बदौलत पर्यटन गांव बन सकते हैं

गांवों में पर्यटन

भारत के गांव-गांव में ऐसी कलाएं मौजूद हैं, जिन्हें पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए तो वे कमाल कर सकती हैं

विश्व पर्यटन संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा गुजरात के धोरडो को 'उत्कृष्ट पर्यटन गांव' घोषित किया जाना देश के लिए गर्व की बात है। इस गांव की तर्ज पर अन्य गांवों में भी पर्यटन की संभावनाएं तलाशने की ज़रूरत है। गुजरात के कच्छ का यह गांव अपनी कई खूबियों के लिए जाना जाता है। इस गांव ने दिखा दिया कि अल्प संसाधनों से भी अपनी पहचान बनाई जा सकती है और रोजगार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं। 

प्राय: गांवों के लिए सबसे बड़ा व्यवसाय कृषि समझा जाता है, लेकिन कच्छ का यह इलाका अधिक उपजाऊ नहीं है। दूर-दूर तक 'सफेद रेगिस्तान' को देखकर हर किसी के मन में यह सवाल पैदा हो सकता है कि यहां कोई पर्यटक क्यों आएगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2009 (तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे) में इस गांव का दौरा कर इसे पर्यटन के नक्शे पर खास पहचान देने की कोशिश की थी। वे साल 2015 में भी धोरडो गए थे। अब यह गांव अपनी समृद्ध संस्कृति व आतिथ्य के साथ हस्तशिल्प के लिए दुनिया में जाना जाता है। यहां मुतवा समुदाय के लोग सुई-धागे के काम में खास महारत रखते हैं। वे जो कढ़ाई करते हैं, वह उनकी पहचान बन गई है। यहां शीशे व चांदी के आभूषण बनाए जाते हैं। 

इसके अलावा टेंट सिटी खास आकर्षण है, जहां देश-विदेश के पर्यटक ठहरते हैं। भारत के अनेक गांवों में पर्यटन के नक्शे पर इस तरह उभरने की क्षमता है, बशर्ते सरकारें इस दिशा में गंभीरता से काम करें। यूरोप से आने वाले कई पर्यटक दो सौ साल पुरानी इमारत को बहुत अचंभे से देखते हैं, जबकि भारत में पांच सौ-एक हजार साल पुराने किले, बावड़ी आसानी से मिल जाते हैं। कई गांवों में इससे भी ज्यादा पुरानी इमारतें, छतरियां हैं, लेकिन न तो स्थानीय लोग उनके संरक्षण की ओर खास ध्यान देते हैं और न सरकारें दिलचस्पी दिखाती हैं।

भारत के हर जिले में ऐसे गांव हैं, जो अपने इतिहास, विशिष्ट कला, प्राकृतिक सौंदर्य, खानपान की बदौलत पर्यटन गांव बन सकते हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में, जहां भारतवासी यूट्यूब पर यह देखते हैं कि अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन ... जैसे देशों के शहरों में लोग कैसे रहते हैं, वहीं इन देशों के लोग भारत के गांवों की जीवनशैली के बारे में जानने की जिज्ञासा रखते हैं। वे महानगरों की भीड़ व चकाचौंध से दूर कुछ दिन गांवों में बिताना चाहते हैं, जहां सुकून व शांति हो। ऐसे में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि गांवों का देश होने के नाते कुदरत हम पर बहुत मेहरबान है। 

उत्तराखंड के एक गांव का युवक, जो सोशल मीडिया पर स्थानीय खानपान आदि से संबंधित वीडियो पोस्ट करता है, ने जो बताया, उस पर सबको गौर करना चाहिए। उसके अनुसार, उत्तराखंड के गांवों में ऐसे कई (वीरान) घर हैं, जिन्हें छोड़कर लोग कस्बों और महानगरों में चले गए, लेकिन उसके वीडियो देखकर अमेरिका से कई लोगों ने संपर्क किया कि वे ऐसे घरों में कुछ दिन बतौर मेहमान रहना चाहते हैं! उन लोगों के पास महंगे घर, गाड़ियां, संसाधन हैं, लेकिन सुकून नहीं है। ओडिशा के एक गांव में गरीब परिवार से आने वाले आदिवासी युवक की खुशी का उस समय ठिकाना नहीं रहा, जब उसके वीडियो पर हजारों व्यूज आने लगे! उसने सिर्फ यही दिखाया था कि उसकी दिनचर्या कैसी है, लोग क्या काम करते हैं, क्या खाते हैं ... ! 

राजस्थान के जयपुर में बाजरे की रोटी, लहसुन की चटनी, छाछ ... आदि परोसने वाले एक होटल में विदेशी पर्यटकों की रौनक छाई रहती है। छत्तीसगढ़ में बस्तर जिले के गांवों में ‘गोदना’ (टैटू) कला इतनी मशहूर है कि यह देश-विदेश के पर्यटकों का ध्यान आकर्षित कर रही है। यहां आदिवासियों का विश्वास है कि ‘गोदना’ इकलौता गहना है, जो जीवन में तो उनके साथ रहता ही है, मृत्यु के बाद भी साथ रहता है। 

भारत के गांव-गांव में ऐसी कलाएं मौजूद हैं। अगर उन्हें पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए तो वे कमाल कर सकती हैं। हां, अगर उनकी उपेक्षा जारी रही तो कुछ दशक बाद उन पर लुप्त होने का खतरा मंडरा सकता है। उनका संरक्षण करना सरकारों के साथ ही स्थानीय लोगों की भी जिम्मेदारी है। अगर पर्यटकों के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराकर रचनात्मक प्रयास किए जाएं तो भारत के अनेक गांव 'धोरडो' बन सकते हैं।

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