मेनिंजाइटिस को सामान्य बोलचाल की भाषा में ‘गर्दन तो़ड बुखार’’ कहा जाता है। यह एक सामान्य और जानलेवा रोग है, इसलिए रोग के लक्षण प्रकट होते ही उपचार शुरु कर देना चाहिए। इस रोग की उत्पत्ति नाइसीरिया मेनिंजाइटिस नामक बैक्टीरिया से होती है। हर एक दशक बाद यह रोग आ धमकता है तथा चार-पांच साल तक कायम रहता है, जिसकी चपेट में लोग आते हैं। प्रायः देखा गया कि पांच साल से छोटी उम्र के बच्चे इसके शिकार अधिक होते हैंै। बच्चों से होता हुआ यह ब़डों तक पहुंच जाता है। गंदी बस्ती या तंग जगहों पर रहने वाले लोगों को यह जल्दी अपनी गिरफ्त में ले लेता है। जनवरी-फरवरी माह में इसका प्रकोप अधिक देखा गया है। इसके जीवाणु मनुष्य की थूक या लार में रहते हैं। जब वह छींकता या खांसता है तो उसके मुंह से निकलकर ये कीटाणु सामने वाले में पहुंच जाते हैं। सर्वप्रथम ये नाक और गले में प्रविष्ट होते हैं, वहां अपना घर बनाकर ब़ढते हैं। चार-पांच दिनों में ही ये स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर देते हैं। परिणामस्वरूप रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।€द्भय् ब्स्र ध्ूय्ह्लय्गले में खराश, नाक बहना, तेज बुखार, गर्दन में दर्द और अक़डन, उल्टियां होना, शरीर में छोटे-छोटे दाने निकलना।जब रोग के जीवाणु मस्तिष्क या मेरुदंड में प्रवेश कर जाते हैं तो गर्दन पूरी तरह अक़ड जाती है। इसे झुकाना या ठो़डी को सीने से लगाना संभव नहीं हो पाता। बुखार काफी तेज होता है। शरीर पर निकलने वाले दाने कूल्हे से शुरु होकर पेट, छाती, बांहों तथा टांगों तक पहुंच जाते हैं।·र्स्ैंफ्ष्ठ ब्ह् र्झ्घ्य्द्य ?यदि इसके लक्षण देखें तो तुरंत डॉक्टर को बताना चाहिए। उपचार में बरती लापरवाही या विलंब के परिणाम अच्छे नहीं होते। इसका असर आंख और कान पर प़डता है और वे खराब हो सकते हैं। समय पर उपचार नहीं कराने पर मृत्यु भी हो सकती है और समय पर उपचार शुरु करने से जान बच भी सकती है। आजकल मेनिंजाइटिस के उपचार के लिए अनेक दवाइयां उपलब्ध हैं। यदि समय पर दवाएं ली जाएं तो एक सप्ताह के भीतर रोगी पूर्णतः रोगमुक्त हो सकता है।फ्ैंद्नप् ब्स् द्धघ्य्प्वैज्ञाविकों ने इसके जीवाणुओं को तीन समूहओं में बांटा है-ए, बी तथा सी। अमेरिकी वैज्ञाविकों ने इन तीनों समूहों के जीवाणुओं के लिए एक टीका विकसित कर लिया है, जिसके लगाने से मेनिंजाइटिस का खतरा नहीं रहता है।

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