‘बच्चों पर भाषण का नहीं, आचरण का होता है असर’

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दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कविजयवा़डा। यहां के कौस्तुभ निवास में पहली बार आयोजित हो रही नवपद की ओली आराधना में मुनिश्री संयमरत्नविजयजी, मुनिश्री भुवनरत्नविजयजी की निश्रा मिल रही है। इसमें बच्चों व ब़डों सहित करीब १०२ आराधकों ने आयंबिल तप किया। इस अवसर पर अपने प्रवचन में मुनिश्री ने श्रीपाल-रास व नवपद महिमा का वर्णन किया। उन्होंेने कहा कि नवपद आराधना में पहले दिन अरिहंत पद की आराधना की जाती है। अरि यानि शत्रु, हंत यानि नाश करने वाला। आत्म-शत्रुओं को परास्त करने वाले अरिहंत कहलाते हैं। उन्होंने कहा कि अरिहंत भगवंत की पवित्र करुणा गंगा से ही अहिंसा धर्म परिपुष्ट हुआ है। बिना अरिहंत के हमें धर्म का ज्ञान नहीं होता, शासन की स्थापना और सत्पथ की प्राप्ति नहीं होती। अरिहन्त परमात्मा के १२ गुण होते हैं, ८ गुण देवकृत और ४ गुण कर्मक्षय होने पर प्रकट होते हैं। मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार प्रजापाल राजा ने अपनी पुत्री सुरसुंदरी और मयणासुंदरी को धार्मिक संस्कार देकर सुसंस्कृत किया वैसे ही समस्त अभिभावकों को अपनी संतान के प्रति जागरूक रहना चाहिए। बच्चों पर अनुशासन रखने से पूर्व स्वयं को स्वयं पर अनुशासन रखना होगा। उन्होंने कहा कि आजकल के बच्चों पर हमारे भाषण का नहीं, अपितु आचरण का असर होता है। अभिभावक की एक साधारण भूल बच्चों के लिए एक अभिशाप के समान है। मुनिश्री ने यह भी कहा कि हमें बच्चों को आत्म-निर्भर बनने की शिक्षा देनी चाहिए। बच्चों को गमले के पौधे की तरह न बनाएं कि पानी न मिले तो सूख जाएं, बल्कि उस जंगल के वृक्ष की तरह बनाएं, जो पानी न मिलने पर भी अपने पैरों पर ख़डा रहता है। प्रवीणभाई वेदमुथा ने मुनिश्री को आयंबिल की गोचरी व्होराकर आयंबिल आराधना की शुरुआत की। आराधकों ने उत्साह व आनंदपूर्वक आराधना व साधना की।

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