विजयवा़डा/दक्षिण भारतयहां के राज-राजेन्द्र भवन में आचार्यश्री जयन्तसेनसूरीजी के शिष्य मुनिश्री संयमरत्न विजयजी, मुनिश्री भुवनरत्न विजय जी ने प्रवचन में कहा कि जहाँ अहंकार है, वहाँ अंधकार है। अहं से मुक्त होकर ही अर्हं बन सकते हैं। कान दो है लेकिन उसका काम एक है सुनना, आँखें दो है किंतु उसका काम एक है देखना,जीभ एक है मगर इसके काम दो है- स्वाद लेना और विवाद करना। जो परमात्मा के स्याद्वाद-सिद्धांत को समझ लेता है,वह कभी भी वाद-विवाद में नहीं उलझता।यदि बोलने में ध्यान न दे तो बिना हड्डी की ये जीभ अच्छे-अच्छे की हड्डी तु़डवा देती है। ये मौन की ही महिमा है कि जब बच्चा नहीं बोलता है तो उसे सभी बुलाते हैं और जब बच्चा ज्यादा बोलने लगता है तो उसे कोई नहीं बुलाता। तोल-तोल कर बोलने वाले के बोल अनमोल होते हैं। वाचाल की जीभ कैंची की तरह चलती है, जो सबको तो़डने का काम करती है और मितभाषी सुई-धागे की तरह सबको जो़डता है। मौनी होने के कारण ही साधु को मुनि कहा जाता है। मुनि के जीवन-उपवन में कहीं भी फर्क नहीं दिखता, उनकी कथनी व करनी में कोई अंतर नहीं होता। जहाँ फर्क है, वहाँ नर्क है और जहाँ समर्पण है,वहाँ स्वर्ग है। सोमवार से कौस्तुभ निवास में मुनिद्वय की निश्रा में श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय के तृतीय ध्वजारोहण निमित्त त्रिदिवसीय महोत्सव प्रारंभ होगा। बुधवार को ध्वजारोहण होगा।

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