बहुत सकारात्मक ऊर्जाप्रदाता व तपोभूमि है श्रवणबेलगोला : आचार्य पुष्पदंतसागर

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श्रवणबेलगोला। बाहुबली महामस्तकाभिषेक महोत्सव में शामिल होने आए आचार्यश्री पुष्पदंतसागरजी म.सा. ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि गोम्मटेश बाहुबली की भूमि बहुत ही पावन है। यहां अनेक साधकों ने अपनी साधनाएं पूर्ण की हैं । इतनी बड़ी प्रतिमा बनाने वाले राजा व शिल्पकार की भावनाएं भी विशुद्ध व निस्वार्थ थीं जिसके कारण यह प्रतिमा विश्व विख्यात हुई है। इसी पर्वत पर अंतिम केवली साढ़े बारह हजार साधुओं के साथ साधना करने रुके थे। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी श्रवणबेलगोला में संन्यास लिया था।

आचार्यश्री ने बताया कि जैन धर्म के जैन ग्रंथों के अधिकांश ग्रंथ रचयिता भी इस भूमि में ही जन्मे हुए हैं। प्रथम मुनि अंजलिक्षर और प्रथम जैनाचार्य शांतिसागरजी म.सा. का जन्म भी इसी भूमि का है। यह भूमि साधु संतों की तपस्याभूमि है। यह असाधारण भूमि बहुत ही ऊर्जावान व तपोभूमि है। गोम्मटेश्वर बाहुबली का महामस्तकाभिषेक भी इस भूमि के आसपास के दूषित वातावरण को शुद्ध करने के लिए है।

आचार्यश्री ने कहा कि भिन्न-भिन्न पंथों के लोग श्रवणबेलगोला आकर एक हो जाते हैंै और आत्मीयता से बाहुबली के दर्शन करते हैं। आचार्यश्री ने स्वास्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी की कार्यप्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि महामहोत्सव का समायोजन व संचालन उनकी निष्पक्ष बुद्धि का प्रमाण है। वे एक महान आत्मा हैंै जिनकी हार्डडिस्क एवं मदरबोर्ड बहुत पॉवरफुल है। अगर भारत भूमि पर चारुकीर्ति जी जैसे भट्टारक हर गांव व शहर में हो जाएं तो देश से समस्त विवादों की दुर्गन्ध अपने आप समाप्त हो जाएगी।

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