महाराष्ट्र और राजस्थान में महिलाएं इस ‘जीवन रक्षक बिंदी‘ का इस्तेमाल भी कर रही हैं। अगस्त तक उत्तर प्रदेश की आदिवासी महिलाओं तक यह बिंदी पहुंचेगी। प्रदेश के ट्राइबल एरिया के सरकारी अस्पतालों के जरिये यह बिंदी मुफ्त बांटी जाएंगी। यह बिंदी नासिक स्थित एनजीओ नीलवसंत मेडिकल फाउंडेशन एंड रिसर्च सेंटर की ओर से देश की महिलाओं को बांटी जा रही हैं। इस बिंदी को बनाने में सिंगापुर की संस्था ग्रे ऑफ गुड भी अपना सहयोग दे रही है। इस बिंदी को बनाने का मकसद महिलाओं को आयोडीन की कमी के कारण होने वाली बीमारियों से बचाना है।ॅष्ठफ्ष्ठ ·र्ैंय्द्ब ·र्ैंद्यत्रर्‍ ब्स् ्यद्धैंख्रर्‍ एनजीओ नीलवसंत की कोऑर्डिनेटर कंचन गवली ने बताया कि आयोडीन त्वचा के माध्यम से भी शरीर में प्रवेश कर सकता है। इसलिए बिंदी को आयोडीन के सॉल्यूशन में खासतौर पर पैच करके तैयार किया गया है। इस बिंदी को जब महिलाएं माथे पर लगाएंगी तो उनको पूरे दिन भर की जरूरत के हिसाब से आयोडीन मिल सकेगा। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। बिंदी से रोजाना महिलाओं को १०० से १५० माइक्रोग्राम आयोडीन मिल सकेगा। इसका नाम ‘जीवन रक्षक बिंदी‘ रखा गया है।ें.र्ीं ·र्ैंद्यह्ठ्ठणक्क द्ब्यब्ध्य्ृह्र द्बष्ठ्र ृय्द्भह्ठ्ठणर्‍द्म ·र्ैंर्‍ ·र्ैंद्बर्‍कंचन गवली ने बताया कि नेशनल आयोडीन डेफिशियेंसी डिसऑर्डर कंट्रोल के प्रोग्राम के आंक़डे बता रहे हैं कि देश में ७.१ करो़ड महिलाएं आयोडीन की कमी से जूझ रही हैं।

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