आंसुओं का मनोभावों से सीधा संबंध है। कभी खुशी में तो कभी गम में आंसू अनायास टपक ही प़डते हैं, परन्तु वर्तमान में प्रचलित मान्यताओं के प्रभाव में लोग आंसुओं को छलकने से पहले प्रायः रोक देते हैं कि कहीं लोग उन्हें बचकाना, भावुक या कमजोर न समझ बैठें। आंसुओं के रूप में भावों का यह दमन विशेषज्ञों के मुताबिक सेहत के लिए ठीक नहीं है। उनके अनुसार, आंखों से आंसुओं का सहज एवं स्वच्छंद बहाव शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से स्वास्थ्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है।आंसुओं को रोकने से दमित भाव विकृत होकर अधिक गंभीर रूप ले लेते हैं। डॉ. राबर्ट प्लाचिक अपनी पुस्तक ‘इमोशन ए साइको इवोल्यूशरी सिथेसिस‘ में लिखते हैं कि आंसुओं के साथ रोना या चिल्लाना, मदद की पुकार का एक संकेत होता है, जो अक्सर सुना जाता है। इसका दमन अन्य आहत क्षणों में भय, क्रोध या उद्विग्नता जैसे मनोभावों की ओर ले जाता है, जिससे अवसाद, कुंठा, द्वंद्व, तनाव एवं अन्य मानसिक विकृतियां जन्म लेती है। आंसुओं को जबरन रोकने से दिल तथा दिमाग पर बोझ प़डने लगता है और यह शरीर में अल्सर एवं कोलाइटिस जैसी व्याधियों का कारण बन सकता है।यदि किसी महिला की आंखों में शोक या संकट की घ़डी में आंसू न आएं तो वह शुष्काग्नि रोग से ग्रसित होती है, जिसे असाध्य माना जाता है। आंसुओं के साथ अनेक अशुद्ध और व्यर्थ चीजें बाहर निकल जाती है। अगर पांच लीटर पानी में तीन चम्मच आंसू मिला दिए जाएं तो सारा पानी खारा हो जाता है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग के प्रयोगों से यह प्रमाणित हो चुका है कि आंसुओं में कीटाणुओं को मारने वाले तत्व होते हैं। इस प्रकार आंसू न केवल आंखों को स्वच्छ करते हैं, बल्कि उन्हें कीटाणुओं से सुरक्षा भी देते हैं।मनोचिकित्सकों के मुताबिक, हमारे अंदर एक भावनात्मक सर्किट होता है, जो मनोभावों का संग्रह करता है। एक समय आता है जब यह सर्किट भावों को संभाल नहीं पाता, जिसका निष्पादन अनिवार्य हो जाता है। इस अवस्था में रोने या चिल्लाने से समस्याओं से जु़डा यह भावनात्मक तनाव हल्का हो जाता है।देखा जाता है कि महिलाएं पुरुष की अपेक्षा कम तनावग्रस्त रहती हैं। इसका मूल कारण यही है कि वे पुरुषों की भांति भावनात्मक संवेगों को दबाती नहीं बल्कि आंसुओं के जरिये मन के भार को हल्का कर देती हैं। इस तरह आंसू प्रकृति द्वारा प्रदत्त सुरक्षा वॉल्व का काम करते हैं।विश्व के महान धीर-वीर एवं दृ़ढवती लिंकन इस कार्य को विधिवत: ढंग से अंजाम देते थे। वे अपने एक संगीतकार मित्र को बुलाते एवं उसे ‘व्हाइट हाउस’’ के एक शांत कमरे में ले जाकर वहां पियानो पर दर्दभरे गीत बजाने को कहते और लिंकन सुनते-सुनते आंसुओं को बहाते और आंसुओं के साथ मन के भावोद्वेग को बहाकर जीवन के भार से हल्के हो जाते। तो अब जब भी भावनाओं के तूफान से गुजरें, जी भर कर रोएं।

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