बीमारियों के ब़ढते खतरे से ल़डने के लिए बच्चे अंदर से तैयार हों। यह काम अभिभावकों को ही करना होता है। शुरुआत से ही उन्हें बच्चों की आदतों और खान-पान का ध्यान रखना होता है। इसमें मां की भूमिका तो सबसे महत्वपूर्ण है ही, लेकिन पिता और घर के दूसरे सदस्यों को यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि बच्चे की मां यह जिम्मेदारी उनके सहयोग से ही पूरी कर सकती है। यह सावधानी बच्चे के जन्म के समय से ही शुरू हो जाती है। एक समय था, जब माना जाता था कि बच्चे के पैदा होने के तुरंत बाद होने वाला मां का पीला दूध बच्चों को नहीं दिया जाना चाहिए। वास्तविकता यह है कि यह ईश्वर की ओर से नवजात के लिए उपलब्ध करवाया गया अमृत है। जन्म के एक घंटे के अंदर हर हाल में बच्चे को मां का दूध जरूर पिलाना चाहिए। यह प्राकृतिक टीका है, जो उसे पैदा होते ही लगाया जा सकता है। अच्छी बात यह है कि शहरों में ही नहीं सुदूर गांवों में भी अब ब़डी तादाद में लोग इस सच्चाई को स्वीकार करने लगे हैं।इसी तरह यह भी जरूरी है कि छह महीने तक के बच्चे को सामान्य तौर पर मां के दूध के अलावा कोई उत्पाद नहीं दिया जाना चाहिए। मगर बच्चों को स्तनपान को लेकर माताओं में कई तरह की गलतफहमियां व्याप्त हैं। कुछ माताएं सोचती हैं कि उनका दूध उनके बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं हो पा रहा। ऐसे में वे बेबी फूड या बाहरी उत्पाद देने को जरूरी मानती हैं, मगर हकीकत यह है कि कुछ ही मामलों में वास्तव में ऐसे उत्पादों की जरूरत होती है।द्बय्ैं ·र्ष्ठैं ख्ररूथ् ·र्ैंय् ्यप्·र्ैंत्झ् द्मब्र्‍्रमां का दूध बच्चों को रोगों से ल़डने की ताकत देता है। यह शरीर में एंटीबाडी पैदा करता है और श्वेत रक्त कोशिकाओं को ब़ढाता है। छोटे बच्चों को कान के संक्रमण, कई तरह की एलर्जी, दस्त, निमोनिया, मेनिनजाइटिस, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन आदि रोगों से बचाने में यह बेहद प्रभावी है। शोध यह भी बताते हैं कि मां का दूध आपके बच्चे की मानसिक ताकत ब़ढाता है। कुछ शोधों के मुताबिक बचपन में पूरी तरह स्तनपान पर निर्भर रहने वाले बच्चों को आगे चलकर गंभीर किस्म की बीमारियों जैसे मधुमेह और कैंसर आदि होने का खतरा बहुत कम होता है। बच्चे के जन्म के कुछ दिन तक होने वाले मां के पीले दूध में तो एंटीबॉडीज बहुत ज्यादा होते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं पर एक परत च़ढा देता है और इस तरह विषाणुओं (वाइरस) से ढाल का काम करता है। शोधों के अनुसार ये एंटीबॉडीज कैंसर और हृदय संबंधी रोगों से ल़डने में भी प्रभावी हैं। इसलिए सलाह दी जाती है कि माताएं एक साल तक बच्चों को जरूर स्तनपान करवाएं। छठे महीने के बाद स्तनपान के साथ उसे बाहरी चीजें भी देनी शुरू की जा सकती हैं।झ्द्भय्श्चञ्च् द्मर्‍्रख्र र्ज्चैंद्यर्‍इसी तरह बच्चों के लिए समय से और पर्याप्त नींद भी बेहद जरूरी है। छोटे बच्चों का शारीरिक विकास सबसे ज्यादा उसी समय होता है, जब वे सो रहे होते हैं। इसलिए यह सुनिश्चित करें कि उन्हें पर्याप्त नींद मिले। छोटे बच्चों को औसतन १८ घंटे तक की नींद चाहिए। एक साल से तीन साल तक के बच्चों के लिए १२ से १३ घंटे की नींद जरूरी होती है, जबकि तीन साल से ब़डे बच्चों को भी १० घंटे की नींद जरूरी होती है। शोध बताते हैं कि जिन बच्चों को पूरी नींद नहीं मिलती, उन्हें बीमारियों के शिकार होने का डर ज्यादा होता है। खास कर क्रेच या पालनघर में रहने वाले बच्चों में इस बात का डर ज्यादा होता है कि उन्हें पूरी नींद न मिले। ऐसी जगहों पर एक साथ कई बच्चों के होने से यह मुमकिन है कि अधिकांश समय कुछ बच्चे खेल-कूद या अन्य गतिविधियों में शामिल हों। इसलिए खासकर छोटे बच्चे के मामले में इस बात का अलग से ध्यान रखना जरूरी है। अगर क्रेच में उसकी नींद पूरी नहीं होती है, तो अभिभावक यह सुनिश्चित करें कि यह कमी घर पर पूरी हो। अगर लगातार बच्चे की नींद पूरी नहीं हो रही हो, तो इस भरपाई के लिए समय से कुछ घंटे पहले ही बिस्तर पर जाना शुरू कर दें।यह ध्यान रखिए कि तमाम उपायों के बावजूद बच्चे बीमार प़डते ही हैं। उनके बीमार प़डने का यह मतलब नहीं है कि आपने अपना काम ठीक तरीके से नहीं किया। ऐसी स्थिति आ ही जाती है, तो बच्चों के डॉक्टर से मिलने में संकोच नहीं करें।

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