चेरापूंजी हो गया है बेंगलूरु

श्रीकांत पाराशर

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बेंगलूरु । बेंगलूरु के मौसम की बेंगलूरुवासी तारीफ करते कभी थकते नहीं। देशभर में भी सुहावने मौसम के लिए यह शहर इतना प्रसिद्ध हो चुका है कि अगर कोई बेंगलूरवासी किसी अजनबी से देश के किसी भी हिस्से में मिल जाए और यह कहे कि बेंगलूरु का रहने वाला हूं, तो सामने वाला व्यक्ति यहां के मौसम की तारीफ करने लगता है भले ही उसने कभी यह शहर न देखा हो। बगीचों का शहर, फूलों की नगरी, एयर कंडीशन्ड सिटी, और भी न जाने क्या क्या। बेंगलूरियन्स को यह सब सुनकर गर्व होना स्वाभाविक है। परंतु पिछले कई दिनों से यहां रोज जो घनघोर बारिश हो रही है उसने गरीब आदमी का तो जीना मुहाल कर दिया है। मध्यमवर्गीय व्यक्ति की परेशानियों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। वह न कुछ कह पा रहा है, न सह पा रहा है। व्यापार ठप हो गया है। दिवाली आने के पहले ही धुल गई है। वाहनचालक रेंग रेंगकर घर पहुंचते हैं। रोज शाम को बारिश होने से घर पहुंचने वाले घंटों तक सड़क पर जाम और पानी से जूझ रहे होते हैं। ऊपर से सड़कों के असंख्य गड्ढे कोढ में खाज जैसी स्थिति पैदा किए हुए हैं। गड्ढों ने कई जानें ले ली हैं, अब बारिश भी बलि ले रही है। आज ही पांच लोगों की मृत्यु की खबर है। कैसी विडंबना है कि जब शहरवासी तरस रहे थे तब एक एक बूंद के लिए तरस गए और अब थोड़ी सी भी बारिश फसल को समूची चौपट कर सकती है, तो बादल हैं कि रोज चिढा चिढाकर बरस रहे हैं। अक्टूबर के महीने में इयनी बरसात कभी नहीं होती। दिन में आसमान साफ रहता है, बादल नदारद रहकर भ्रम पैदा करते हैं। कुछ ही देर में अचानक हवा का रुख बदलता है और काले घने बदरा आसमान में उमड़ घुमड़ करने लगते हैं। फिर इतना जोर से बरसते हैं मानो शहर को ही बहा ले जाएंगे। जो जहां है, वहीं ठहर जाता है। शहर तरबतर हो जाता है। जनजीवन ठप पड़ जाता है। निर्धन को तो रात भी जागकर गुजारनी पड़ती है, भूखा भी रहना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं। सरकारी मौसम विभाग कीर्तिमानों के आंकड़े जुटाने और जारी करने में व्यस्त है, महानगरपालिका बरसात रुकने का इंतज़ार कर रही है ताकि उसकी भद्द पिटने से रुके। सरकार जनता का ध्यान बंटाने के लिए रोज कुछ नई योजना या कार्यक्रम की घोषणा करती है तो विपक्ष सुबह से ही धरना, विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम तय कर लेता है। शहर का आम व्यक्ति रोज मध्यरात्रि तक बारिशजनित परेशानियों से जूझता हुआ थक हार कर आंख झपकता है, एक सुहानी सुबह और एक अच्छे दिन की आस में, ताकि अगलादिन कठिनाई भरा न हो और परिवार के लिए वह कुछ कमाधमा कर सुकून से समय पर घर लौट आए। परंतु बरसात रोज उसके सपनों पर पानी फेर  देती है और वह कभी ईश्वर से प्रार्थना करता है कि बस बहुत हो गया, अब रहम करो, तो कभी प्रशासन को मन ही मन गालियां देता है कि यह अमला न जाने कब सुधरेगा और जनता की सुध लेगा। बहरहाल, हाल कुछ अच्छे नहीं हैं शहर के और शहरवासियों के।

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