बेंगलूरु/दक्षिण भारतशहर के माग़डी रोड स्थित ईटा गार्डन स्थानक में विराजित उपाध्यायश्री रवीन्द्रमुनिजी ने गुरुवार को धर्मसभा में कहा कि हमारी संस्कृति की संसार को ब़डी से भी ब़डी जो देन है वह अहिंसा है। अहिंसा जो व्यक्ति व्यक्ति की मन शांति से लेकर विश्व शांति का का मूल है और जिसके सामने हर संहारक शक्ति कुंठित हो जाती है। जैन तीर्थंकरों ने तो अहिंसा का इतना जोर से उद्घोष किया है कि हरेक मत परम्परा में हम उसकी प्रतिध्वनि किसी न किसी रूप में पाते ही हैं। यह समस्त मानव परम्परा में सर्वोच्च बात है ,सर्वश्रेष्ठ जीवन मूल्य है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। संतश्री ने कहा कि मानवीय भावनाओं में सबसे सुकोमल अहिंसा भावना है जिसकी निर्दोष और सरल प्रेमिल छाया में संसार का हर जीवन शांति और समाधान पाता है। हिंसा जो जीवन का अनिवार्य हिस्सा है उसे भी अगर कृतज्ञतापूर्वक देखें तो वह भी आपसी आदान प्रदान का सर्वोच्च मूल्य बनकर अहिंसा का ही एक रूप बन जाता है। मुनिजी ने कहा कि जब तक हम आपने जीवन में अपनेपन के गहरे भाव को पैदा न कर लें,जब तक हम सबको अपना न समझें तब तक किसी भी समाज और व्यक्ति का उद्धार सम्भव ही नहीं है। वैर और विरोध का हरेक क्षण हमारे आपसी सम्बन्धों का घातक तो है ही बल्कि जीवन की हरेक अशांति और असमाधि का मूल कारण भी है। हिंसा,घृणा,द्वेष जीवन के घातक से भी घातक तत्व हैं जिनसे हम दूसरों का घाटा कर पाएं या न कर पाएं स्व का घाटा तो कर ही लेते हैं । उन्होंने कहा कि संसार में जितने भी दुख है वो सब भौतिक, दैविक या आध्यत्मिक हैं एक भी दुःख प्राकृतिक नहीं है इसका मतलब यही है कि दुःख जीव की अपनी ही ईजाद है प्रकृति का दिया हुआ दंड नहीं है। हम सब अपने दुखों के पूरे जिम्मेवार हम स्वयं ही हैं इसलिए मन में प्रकृति से नहीं बल्कि स्वयं में ही पलने वाली घृणा द्वेष आदि की दुखदायी भावनाओं से बचकर रहें और प्रेम,अहिंसा आदि शांति और समाधान दायक भावनाओं को पालें। वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने बताया कि मुनिश्री शुक्रवार को भी ईटा में विराजित रहेंगे।

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