दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। स्थानीय राजाजीनगर स्थित शंखेश्वर पार्श्वनाथ जैन संघ के तत्वावधान में आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी की निश्रा में शुक्रवार को श्री आदिनाथ भगवान का जन्म एवं दीक्षा कल्याणक मनाया गया। इस अवसर पर संगीतमय भावयात्रा में स्तुतियों के द्वारा भगवान के १३ भवों का वर्णन किया गया व श्रद्धालुओं ने आयंबिल तप किए। इस अवसर पर आचार्यश्री ने परमात्मा के जीवन चरित्र का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि संसार में भटकती आत्मा को भगवान के दर्शन प्राप्त होना भी अति दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि प्रतिमा रुप में उनकी उपस्थिति हमारे लिए उनका साक्षात्कार कराने में समर्थ है। साथ ही उनके जीवन प्रसंगों का संपूर्ण वर्णन करते धर्मशास्त्र हमें उनका परिचय कराते है। रत्नसेनजी ने कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि तीर्थंकर भगवान के जीवन चरित्र का श्रवण-पठन करने से हमारे करो़डों भवों के पापों का नाश होता है। उन्होंने कहा कि मानव देह में अंगों की सच्ची सार्थकता तभी है जब वह परमात्मा में एकाकार हो। आचार्यश्री ने कहा कि जिस हृदय में परमात्मा का वास रहा है वह हृदय भी अत्यंत प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि हमारी आत्मा पर छाये हुए अज्ञान एवं मिथ्यात्व के अंधेरे को दूर करने के लिए परमात्मा ही शरण है। इस दुनिया में चाहे कोई कितना ही ब़डा व्यक्ति क्यों न हो, लेकिन वह स्वयं जब तक सभी गुणों से पूर्ण न हो तब तक वह हमें पूर्णता तक नहीं ले जा सकता है।

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