प्रतिमा में प्राण डालने की क्रिया है अंजनशलाका

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दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबिरुर। यहां विमलनाथ नवग्रह सुवर्ण जिनालय के प्रतिष्ठा महामहोत्सव में मंगलवार को अंजनशलाका संबंधित पूजा आचार्यश्री स्थूलभद्रसूरीश्वरजी म. सा. के शिष्य आचार्य श्री चन्द्रयशसूरीश्वरजी म. सा. एवं प्रवर्तक श्री कलापूर्ण विजयजी म. सा. की निश्रा में सम्पन्न हुई। इस मौके पर आचार्यश्री ने अंजनशलाका विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पाषाण की प्रतिमा में प्राण डालने की प्रक्रिया को अंजनशलाका विधि कहा जाता है। इसलिए महोत्सव को प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का नाम दिया जाता है जिसमें क्षेत्रपाल, मणिभद्र, वीर नाको़डा, भैरव आदि देवताओं की पूजन होती है। जिनशासन में सोलह विद्यादेवी व आदि देवी का पूजन होता है। अंजनशलाका अर्थात सर्वोदय के सर्जनहार का सुन्दर विधान। वीतराग परमात्मा के परम ऐश्वर्यपूर्ण जीवन के विशिष्ट प्रसंगों को जीवित दृश्य देखने का सौभाग्य हमें महोत्सव में मिलता है। परमेश्वर के जीवन के पांच कल्याणकों का मंत्राक्षरों द्वारा उल्लेख करने का सुन्दर अवसर अंजनशलाका है। अंजनशलाका महाविधान होते ही पाषाण की प्रतिमा स्वयं भगवान बन जाती है। प्रभु के प्रागट्य का अनमोल दृश्य देखने को सुन्दर अवसर हम सभी को प्राप्त होगा।इस मौके पर सर्वधर्म सम्मेलन हुआ। जिसमें रुद्रमुनि शिवाचार्य महास्वामी, पूर्व विधायक केबी म्ल्किकार्जुन, पत्रे सदाशिवन, श्रीमती शैलजा और एस रमेश उपस्थित थे। सभी ने जिनालय के शिल्पकला की प्रशंसा करते हुए कहा कि बेल्लूर और होलेबेन्नूर जैसी कलाकृतियां संगमरमर में उकेरी हैं। सुबह नाश्ते के लाभार्थी रिखचन्द मीठालाल बंदामूथा, दोपहर नवकारशी के लाभार्थी कांतिलाल पवनबाई कांकरिया एवं शाम की नवकारशी के लाभार्थी भंवरलाल भीमराज कांकरिया परिवार रहे। महोत्सव के दौरान बुधवार से पंचकल्याणक उत्सव का प्रारंभ हो जाएगा।

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