चेन्नई/दक्षिण भारतयहां के आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में पुष्पागिरि तीर्थ प्रणेता आचार्यश्री पुष्पदंतसागरजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिसके जीवन में कोई मित्र नहीं, साथी नहीं, प्रेमी नहीं उसका जीवन रेगिस्तान में तपती धूल के समान है। आचार्यश्री ने कहा कि जो स्वयं तृप्त है वहीं पथिक को भी तृप्त करेगा। आचार्यश्री ने कहा कि जिस व्यक्ति ने संत संगति की है, संतों को अपना मार्गदर्शक चुना है उसका जीवन खिले हुए फूलों सा महकता उद्यान है जिसकी मित्रता की गंध और प्रेम की सुवास चारों ओर उ़डकर भूमंडल में सुरभि फैला रही है। आचार्यश्री पुष्पदंतसागरजी ने कहा कि फूलों का जानकर एवं माली ही फूलों का मूल्याकंन कर सकता ह। मनुष्य को भीतर जब सौंदर्य की अनुभूति होती है, तभी बाहर का सौंदर्य दिखाई प़डता है। ज्ञानी वही है जो जीवन में सौंदर्य को जागृत करता है और भीतर की सुन्दरता के अनुभवों को जीता है। इस अवसर पर मुनिश्री प्रमुखसागरजी व परागसागरजी ने भी उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित किया।

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