हावेरी। राष्ट्रसंत श्री ललितप्रभसागरजी ने कहा है कि विचार व्यक्ति के शत्रु भी हैं और दुश्मन भी। जहां अच्छे विचार जीवन में स्वर्ग के द्वार खोलते हैं वहीं बुरे विचार जीवन को नरक की आग में झोंक देते हैं। विचारधारा को निर्मल, पवित्र और सुंदर बना लेना ही ईश्वर की सर्वोपरि पूजा और भक्ति है। उन्होंने कहा कि अच्छी विचारधारा बेहतरीन रिश्तों का आधार है, महान व्यक्तित्व की नींव है व मानसिक शांति और आनंद पाने का पहला सूत्र है। संतश्री सोमवार को यहां जैन मंदिर के पास स्थित आराधना भवन में आदिनाथ जैन संघ द्वारा आयोजित प्रवचन कार्यक्रम के दौरान श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विचारों से शब्द का, शब्दों से वाणी का, वाणी से व्यवहार का और व्यवहार से आदतों का निर्माण होता है। अगर हमें श्रेष्ठ व्यवहार और प्रभावशाली वाणी का मालिक बनना है तो पहले विचारों को श्रेष्ठ और प्रभावशाली बनाना होगा। केवल प्रवचन सुनने या किताबें प़ढ लेने भर से कुछ न होगा। विचारों को निर्मल बनाने के लिए हमें संकल्प लेना होगा और जीवन के प्रति जागरूक बनना होगा। इससे पूर्व मुनिश्री शांतिप्रियसागरजी ने कहा कि हमारे लिए उपवास करना, माला फेरना, पूजा-पाठ करना और दान देना सरल है, पर अपने स्वभाव को सुधारना ब़डा मुश्किल है। व्यक्ति जब भी दुखी होता है तो दूसरों के कारण नहीं अपने स्वभाव के कारण दुखी होता है। जो अपने स्वभाव को सरल और मीठा बना लेता है उसका जीवन स्वस्थ और सुखी बन जाता है। उन्होंने स्वभाव सुधारने के लिए जीवन में आने वाली हर परिस्थिति का स्वागत करने की प्रेरणा दी। शांतिप्रियजी ने कहा कि जो मुश्किलों में मुरझाता है वह टूट जाता है, पर जो मुश्किलों में भी मुस्कुराता है वह जिंदगी की जंग जीत जाता है। श्रीललितप्रभजी और मुनिश्री के हावेरी पहुंचने पर जैन और जैनेत्तर समाज के श्रद्धालुओं ने स्वागत किया। अक्षत उछालकर बधावणा किया और जयकारे भी लगाए। अध्यक्ष ताराचंद राठौ़ड ने सभी का आभार ज्ञापित किया।

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